CM डॉ. मोहन यादव के आदेश के बाद भी नहीं हटा 25 साल पुराना दो-संतान नियम

GAD में अटका मामला, तीन संतान वालों की सरकारी नौकरी पर अब भी असमंजस, कर्मचारी संगठन लंबे समय से कर रहे विरोध

CM डॉ. मोहन यादव के आदेश के बाद भी नहीं हटा 25 साल पुराना दो-संतान नियम

भोपाल। मध्यप्रदेश में सरकारी नौकरी से जुड़े करीब 25 साल पुराने दो-संतान नियम को खत्म करने की कवायद के बावजूद मामला अभी पूरी तरह साफ नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री Dr. Mohan Yadav ने जून में प्रस्तावित सिविल सेवा नियमों से दो से अधिक जीवित संतान वाले उम्मीदवारों को सरकारी नौकरी से अयोग्य करने का प्रावधान हटाने के निर्देश दिए थे। इसके बाद भी नियम को औपचारिक रूप से खत्म करने की प्रक्रिया को लेकर अब असमंजस बना हुआ है।

मध्यप्रदेश में यह प्रावधान वर्ष 2001 से लागू है। इसके तहत 26 जनवरी 2001 या उसके बाद दो से अधिक जीवित संतान होने की स्थिति में सरकारी नौकरी की पात्रता प्रभावित होती रही है। सेवा में मौजूद कर्मचारियों के लिए भी दो से अधिक संतान का मामला आचरण नियमों से जुड़ा रहा है।

CM के निर्देश के बाद फिर क्यों उठा मामला?

6 जून को प्रस्तावित MP Civil Services Rules-2026 के ड्राफ्ट में दो-संतान संबंधी प्रावधान फिर शामिल होने के बाद मामला गरमा गया था। मुख्यमंत्री ने इस पर आपत्ति जताते हुए GAD को प्रावधान हटाने और संशोधित ड्राफ्ट जारी करने के निर्देश दिए। लेकिन अब सवाल यह है कि CM के निर्देश को अंतिम कानूनी बदलाव में कब बदला जाएगा।

इस बीच कर्मचारी संगठन भी इस प्रावधान का लंबे समय से विरोध करते रहे हैं। उनका तर्क है कि परिवार में तीसरी संतान होने के कारण किसी कर्मचारी की नौकरी या नौकरी की पात्रता प्रभावित करना उचित नहीं है। दूसरी ओर, इस नियम का मूल उद्देश्य परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण रहा है।

सिंगरौली के अशोक सिंह मामला बना मिसाल

नियम की गंभीरता का उदाहरण सिंगरौली के सब-रजिस्ट्रार अशोक सिंह परिहार का मामला है। जून में दो से अधिक संतान के आधार पर उनकी सेवा समाप्त कर दी गई थी। इसके बाद उन्होंने शासन में अपील की और सेवा समाप्ति के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी गई। अंतिम स्थिति पर निर्णय होना बाकी है।

यानी फिलहाल “तीन बच्चे हैं तो नौकरी निश्चित रूप से चली जाएगी” कहना सही नहीं होगा। मामला संबंधित नियम, संतान के जन्म की तारीख, कर्मचारी की स्थिति और विभागीय कार्रवाई पर निर्भर करता है।

MP अकेला राज्य नहीं

दो-संतान से जुड़े प्रावधान अलग-अलग रूप में राजस्थान, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, ओडिशा, उत्तराखंड और असम समेत कई राज्यों में लागू रहे हैं। कहीं इसका संबंध सरकारी नौकरी से रहा तो कहीं पंचायत या स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने की पात्रता से।

हालांकि अब कुछ राज्यों ने ऐसे प्रतिबंधों में बदलाव किया है। इसकी एक वजह बदलती जनसांख्यिकी और घटती जन्मदर भी है। देश के कई राज्यों में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे पहुंच चुकी है। ऐसे में जहां कभी सरकारों की चिंता बढ़ती आबादी थी, वहीं अब कुछ राज्यों में भविष्य में कामकाजी आबादी घटने और बुजुर्ग आबादी बढ़ने की चिंता भी सामने आ रही है।

अब सबसे बड़ा सवाल

मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद क्या मध्यप्रदेश सरकार इस 25 साल पुराने प्रावधान को पूरी तरह और कानूनी रूप से खत्म करेगी? और यदि नियम खत्म होता है तो पुराने मामलों, लंबित विभागीय कार्रवाई और उन अभ्यर्थियों का क्या होगा जिन्हें इसी प्रावधान के कारण नौकरी से बाहर किया गया या पात्र नहीं माना गया?

जब तक संशोधित नियम की अंतिम अधिसूचना स्पष्ट नहीं होती, तीन संतान वाले कर्मचारियों और नौकरी के उम्मीदवारों के लिए असमंजस पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।