WeatherNext 3 : Google का ये नया AI मॉडल बताएगा मौसम का हाल, जानें इसकी खासियत
WeatherNext 3 : कंपनी के मुताबिक, यह उसका अब तक का सबसे एडवांस ग्लोबल वेदर AI मॉडल है। यह लाइव जियोस्टेशनरी सैटेलाइट डेटा से जानकारी लेता है।
WeatherNext 3 : टेक डेस्क। मौसम कब बदल जाएगा, इसका सटीक अनुमान लगाना हमेशा आसान नहीं होता। कुछ किलोमीटर की दूरी पर भी तापमान अलग हो सकता है। अचानक बारिश और तेज हवाएं भी मौसम बदल देती हैं। ऐसे में सटीक पूर्वानुमान खेती, बिजली उत्पादन और आपदा प्रबंधन के लिए बेहद जरूरी है। इसी दिशा में Google ने अपना नया AI मॉडल WeatherNext 3 पेश किया है।
हर घंटे तैयार होगा नया पूर्वानुमान
Google DeepMind और Google Research ने 3 सितंबर को WeatherNext 3 लॉन्च किया। कंपनी के मुताबिक, यह उसका अब तक का सबसे एडवांस ग्लोबल वेदर AI मॉडल है। यह लाइव जियोस्टेशनरी सैटेलाइट डेटा से जानकारी लेता है और हर घंटे नया मौसम पूर्वानुमान तैयार कर सकता है।

पहले से ज्यादा हाई रिजॉल्यूशन
WeatherNext 2 करीब 25 किलोमीटर के ग्रिड पर हर छह घंटे में पूर्वानुमान तैयार करता था। वहीं WeatherNext 3 सतह से जुड़े प्रमुख मौसम डेटा को 5 किलोमीटर तक के रिजॉल्यूशन में दिखाता है। दूसरे सतही डेटा के लिए 10 किलोमीटर और वायुमंडलीय डेटा के लिए 25 किलोमीटर रिजॉल्यूशन का इस्तेमाल किया जाता है। Google के अनुसार, इससे मौसम की तस्वीर पहले से करीब पांच गुना ज्यादा साफ हो जाती है।
बारिश का अनुमान लगाने में बेहतर
WeatherNext 3 को तेजी से बदलने वाली बारिश जैसी स्थितियों के लिए तैयार किया गया है। इसे NASA के IMERG और सैटेलाइट रडार आधारित बारिश के डेटा से प्रशिक्षित किया गया है। Google के अनुसार, कुछ परीक्षणों में मॉडल ने पुराने तरीकों के मुकाबले बेहतर परिणाम दिए हैं। इससे बारिश की जगह और समय का अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है।
सोलर और विंड एनर्जी में भी उपयोग
यह मॉडल मौसम पूर्वानुमान के साथ ऊर्जा क्षेत्र में भी काम आएगा। WeatherNext 3 करीब 100 मीटर की ऊंचाई पर हवा की गति का अनुमान लगा सकता है। इससे विंड एनर्जी उत्पादन का आकलन किया जा सकेगा। यह बादलों और सूर्य की किरणों का भी पूर्वानुमान देता है। इससे सोलर फार्म अपनी संभावित बिजली उत्पादन क्षमता का बेहतर अनुमान लगा सकेंगे।
Search से Maps तक इस्तेमाल
Google WeatherNext 3 को Search, Gemini, Google Maps, Maps Platform Weather API और Earth Engine में इस्तेमाल करने की तैयारी कर रहा है। डेवलपर्स और रिसर्चर्स के लिए इसका डेटा BigQuery, Earth Engine और Google Cloud Storage के जरिए उपलब्ध कराया जाएगा। Google का कहना है कि यह तकनीक एशिया-प्रशांत, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी हो सकती है।

