जंगलों की रक्षा करने वाले मृदुल कुमार पाठक अब अपनी जिंदगी बचाने की लड़ रहे हैं जंग

गंभीर फेफड़ों की बीमारी के चलते मृदुल कुमार पाठक को लंग ट्रांसप्लांट की जरूरत है। परिवार के अनुसार, उनका इलाज चेन्नई के अपोलो हॉस्पिटल में चल रहा है।

जंगलों की रक्षा करने वाले मृदुल कुमार पाठक अब अपनी जिंदगी बचाने की लड़ रहे हैं जंग

मध्य प्रदेश। वन और वन्यजीवों के लिए समर्पित मृदुल पाठक ने उम्रभर जंगलों और वन्यजीवों की जिंदगी बचाने में लगा दी, आज वही सांसों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें लंग ट्रांसप्लांट की जरूरत है। कभी उन्होंने जंगलों की खामोशी में बाघों की दहाड़ सुनी थी।

कभी वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए दिन-रात जंगलों में भटकते रहे। कभी उन बेजुबान जीवों के लिए फैसले लिए, जो अपनी तकलीफ किसी से कह नहीं सकते थे। आज वही मृदुल कुमार पाठक अपनी जिंदगी की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रहे हैं।

मध्यप्रदेश राज्य वन सेवा से अपने करियर की शुरुआत करने वाले मृदुल कुमार पाठक बाद में भारतीय वन सेवा में शामिल हुए। उन्होंने मध्यप्रदेश के जंगलों और वन्यजीवों की सेवा में अपना लंबा कार्यकाल बिताया। उमरिया के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व जैसे देश के महत्वपूर्ण बाघ संरक्षण क्षेत्र के फील्ड डायरेक्टर के रूप में भी उन्होंने जिम्मेदारी संभाली।

दशकों तक जंगलों, वन्यजीवों और उनसे जुड़े लोगों की सेवा करने के बाद वे मार्च 2019 में सेवानिवृत्त हुए। लेकिन जिंदगी ने अब उनके सामने ऐसी चुनौती रख दी है, जिसके सामने परिवार की सारी ताकत छोटी पड़ रही है।

अब लड़ाई जंगल की नहीं, सांसों की है

मृदुल कुमार पाठक फेफड़ों की गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। उनकी हालत इतनी गंभीर हो चुकी है कि फेफड़े सामान्य रूप से काम नहीं कर पा रहे हैं।

 चेन्नई के अपोलो हॉस्पिटल में उनका उपचार चल रहा है। परिवार के अनुसार, डॉक्टरों ने लंग ट्रांसप्लांट यानी फेफड़े के प्रत्यारोपण को जीवन बचाने का प्रमुख विकल्प बताया है। लेकिन यहां एक और बड़ी चुनौती है।

वे सामान्य तरीके से भोपाल से चेन्नई तक यात्रा करने की स्थिति में नहीं हैं। उन्हें ECMO सपोर्ट के साथ एयर एम्बुलेंस से चेन्नई के अपोलो हॉस्पिटल में रविवार को ले जाया गया। ECMO एक अत्याधुनिक लाइफ-सपोर्ट सिस्टम है, जो गंभीर स्थिति में शरीर को ऑक्सीजन उपलब्ध कराने और फेफड़ों के काम को सहारा देने में मदद करता है।

डोनर मिलने तक हर दिन उम्मीद का इंतजार

चेन्नई पहुंचने के बाद उपयुक्त डोनर मिलने तक उन्हें ECMO और गहन चिकित्सा निगरानी में रखा जाना पड़ सकता है। यह इंतजार कितने दिन चलेगा, इसकी निश्चित भविष्यवाणी संभव नहीं है। परिवार के सामने सबसे बड़ी चिंता यही है कि हर बीतता दिन इलाज का खर्च बढ़ा रहा है।

परिवार द्वारा साझा किए गए अनुमान के अनुसार उपचार, अस्पताल में रहने और रिकवरी की अवधि को मिलाकर संभावित कुल खर्च - लगभग ₹2.75–3 करोड़, यह केवल एक अनुमान है। वास्तविक खर्च उपचार की अवधि, डोनर मिलने में लगने वाले समय और अन्य चिकित्सकीय जरूरतों के अनुसार बदल सकता है।

एक बेटे की सबसे बड़ी चिंता

आज डॉ. अंकुर पाठक (मोबाइल न. 7692822228) अस्पताल में अपने पिता के बिस्तर के पास बैठे हैं। वे अपने पिता के लिए हिम्मत बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनके सामने एक ऐसा सवाल भी खड़ा है, जिसका जवाब अकेले किसी एक परिवार के पास नहीं है, इतनी बड़ी रकम का इंतजाम कैसे होगा? परिवार अपनी जमा-पूंजी का बड़ा हिस्सा पहले ही इलाज में लगा चुका है।

अब आगे की लड़ाई के लिए उन्हें समाज, मित्रों, सहकर्मियों और उन तमाम लोगों की मदद की जरूरत है। एक जिंदगी बचाने के लिए आगे आ सकते हैं। मृदुल कुमार पाठक ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा में लगा दिया। आज उनके लिए किसी जंगल को नहीं, एक जिंदगी को बचाने की जरूरत है। इस अपील को साझा कीजिए और यदि संभव हो, तो मदद का हाथ बढ़ाइए।