रक्षाबंधन से पहले महंगी हुई चीनी: इथेनॉल या जमाखोरी, किसकी वजह से बढ़े दाम?
रक्षाबंधन से पहले चीनी के दामों में तेजी से आम लोगों की चिंता बढ़ गई है। जानिए चीनी महंगी होने की असली वजह इथेनॉल, कम उत्पादन, बढ़ती मांग या जमाखोरी में से क्या है।
रक्षाबंधन और आने वाले त्योहारों से पहले शक्कर की मिठास महंगाई में बदल गई है। कई स्थानीय बाजारों में चीनी के दाम 55 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 66 रुपये किलो तक पहुंच गए हैं। यानी सिर्फ एक महीने में 11 रुपये प्रति किलो या करीब 20 प्रतिशत की तेजी देखी गई है।
सरकारी औसत आंकड़ों में भी चीनी की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर त्योहारों से ठीक पहले शक्कर इतनी महंगी क्यों हो गई?
इथेनॉल को लेकर विपक्ष का हमला
चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने केंद्र सरकार की इथेनॉल नीति पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का तर्क है कि गन्ने और चीनी का इस्तेमाल पेट्रोल में मिलाए जाने वाले इथेनॉल के उत्पादन में बढ़ने से बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई और कीमतों में तेजी आई।
आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने भी E20 और इथेनॉल नीति को लेकर सरकार को घेरा है।
सरकार का जवाब—इथेनॉल नहीं है मुख्य वजह
केंद्र सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। सरकार के मुताबिक 2022-23 में इथेनॉल के लिए डायवर्ट होने वाली चीनी करीब 12 प्रतिशत थी, जो 2025-26 में घटकर करीब 9 प्रतिशत रह गई है।
सरकार का यह भी कहना है कि देश में बनने वाले कुल इथेनॉल का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्का जैसे स्रोतों से तैयार हो रहा है।
आखिर क्यों बढ़े दाम?
सरकार ने चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे कई कारण बताए हैं—
- अनुमान से कम चीनी उत्पादन
- मौसम से गन्ने की फसल को नुकसान
- त्योहारों के कारण बढ़ती मांग
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेजी
- जमाखोरी और सट्टेबाजी
सरकारी आंकड़ों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी 30 जून से 20 अगस्त के बीच चीनी की कीमतों में 16 प्रतिशत से ज्यादा तेजी देखी गई।
उत्पादन में भी कमी
सरकार के अनुसार चीनी उत्पादन का शुरुआती अनुमान करीब 343 लाख टन था, जिसे बाद में घटाकर लगभग 306 लाख टन कर दिया गया। यानी उत्पादन अनुमान में करीब 11 प्रतिशत की कमी आई है। इससे घरेलू बाजार में आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ी है।
कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने जमाखोरी पर सख्ती की है और आपूर्ति बढ़ाने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति भी दी है।
बड़ा सवाल अभी भी बरकरार
विपक्ष का आरोप है कि इथेनॉल नीति ने चीनी की उपलब्धता कम की, जबकि सरकार इसे कम उत्पादन, मौसम, बढ़ती मांग और जमाखोरी का नतीजा बता रही है।
यानी सवाल अब भी वही है—शक्कर की महंगाई के लिए असली जिम्मेदार कौन है? इथेनॉल नीति, कम उत्पादन या फिर जमाखोरी?
त्योहारों के मौसम में आम उपभोक्ता की नजर अब इसी बात पर है कि सरकार के कदमों के बाद चीनी के दाम कम होते हैं या रसोई की मिठास पर महंगाई का असर और बढ़ता है।

