जन सेवा से देश सेवा के 25 वर्ष

इस महायात्रा का पहला पड़ाव था, शासन को फाइलों से निकालकर परिणामों से जोड़ना। गुजरात में कृषि, सिंचाई, बिजली, सड़क, उद्योग और निवेश को साथ लेकर विकास को जनभागीदारी से जोड़ा गया।

जन सेवा से देश सेवा के 25 वर्ष

1. जन सेवा से देश सेवाः कर्मयोगी की अथक यात्रा
2. कर्म से कीर्ति तक: सेवा के 25 वर्ष

विष्णु दत्त शर्मा

7 अक्टूबर 2001 को जब नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह शुरुआत भारतीय राजनीति का स्वर्णिम भविष्य बनेगी। एक कर्मयोगी की 25 वर्ष पहले शुरू हुई यह यात्रा गुजरात से दिल्ली और दिल्ली से वैश्विक मंचों तक पहुँच चुकी है। इस कालखंड को केवल शासन की निरंतरता कहना पर्याप्त नहीं बल्कि इसे समझने की कुंजी तीन शब्दों में है: सेवा, सुशासन और संकल्प। वस्तुतः यह एक कर्मयोगी की देश सेवा से जन सेवा की महायात्रा है, जिसमें पग-पग संकल्प दिखता है। 

इस महायात्रा का पहला पड़ाव था, शासन को फाइलों से निकालकर परिणामों से जोड़ना। गुजरात में कृषि, सिंचाई, बिजली, सड़क, उद्योग और निवेश को साथ लेकर विकास को जनभागीदारी से जोड़ा गया। यही अनुभव 2014 में राष्ट्रीय शासन-दृष्टि का आधार बना-ऐसा विकास, जिसमें किसान से कारीगर और गाँव से महानगर तक हर नागरिक भागीदार बने।

मोदी जी के कर्मपथ के केंद्र में सदा गरीब और वंचित रहे हैं। मई 2014 की जनधन योजना से शुरू हुई यात्रा डीबीटी, पीएम आवास, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, किसान सम्मान निधि, मुद्रा और अटल पेंशन जैसी पहलों तक पहुँची। इन प्रयासों ने करोड़ों लोगों को औपचारिक आर्थिक व्यवस्था और अवसरों से जोड़ा। संदेश स्पष्ट था- गरीब केवल सहायता का पात्र नहीं, अवसर का हकदार है। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का यही मर्म है और यही अंत्योदय के संकल्प का साकार रूप। आज किसी भी गाँव से गुजरिए, प्रधानमंत्री आवास की दीवारें गरीब के मन की मुस्कान बयां करती हैं और आयुष्मान कार्ड संजीवनी बनकर उसका आत्मविश्वास बढ़ा रहा है।

भ्रष्टाचार की मार से कराह रहे देश में मोदी जी ने सुशासन की नई कसौटी सुनिश्चित की और सरकार तथा नागरिक के बीच की दूरी घटती चली गई। कभी कहा जाता था कि दिल्ली से गरीब के लिए भेजे गए एक रुपये में से मात्र 15 पैसे ही उस तक पहुँचते हैं। डिजिटल सेवाओं, डीबीटी और डिजिटल भुगतान ने इस कहानी को पलट दिया। लाभ सीधे खाते में पहुँचे और बिचौलियों की भूमिका खत्म हुई। इस अर्थ में आज सुशासन दफ्तरों की कार्यकुशलता भर नहीं, नागरिक के जीवन में सरलता, पारदर्शिता और भरोसा पैदा करने की प्रक्रिया बना है। सेवा-संकल्प की असली कसौटी वहीं है, जहाँ व्यवस्था की पहुँच सबसे कम होती है। दशकों से संस्थागत ऋण से दूर रेहड़ी-पटरी वालों को प्रधानमंत्री स्वनिधि ने पूंजी और डिजिटल लेन-देन से जोड़ा। विश्वकर्मा योजना ने पारंपरिक कारीगरों को पहचान, प्रशिक्षण, आधुनिक औजार, ऋण और बाजार का सहारा दिया। दोनों के पीछे एक ही विचार था कि जिसके पास श्रम और कौशल है, उसे अवसर और सम्मान मिलना चाहिए।

जनसेवा का सुफल है कि स्वच्छ भारत अभियान ने गाँव-गाँव शौचालय पहुँचाए और स्वच्छता को आदत बनाया। 'फिट इंडिया' और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस ने करोड़ों युवाओं को स्वस्थ जीवन शैली की राह दिखाई। एक दर्जन से अधिक नए एम्स खुले, मेडिकल कॉलेज और आईआईटी दोगुने हुए और लंबी प्रतीक्षा के बाद देश को नई शिक्षा नीति मिली। यह सफलता हमें बताती है कि सुशासन का अर्थ स्वस्थ, शिक्षित और स्वच्छ समाज का निर्माण भी है।

नरेंद्र मोदी जी के आत्मनिर्भर भारत का विचार इसी संकल्प को आर्थिक विस्तार देता है। विपक्षी आलोचनाओं को आईना दिखाते हुए मोदी जी ने सिद्ध किया कि आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं, बल्कि अपनी उत्पादन क्षमता, तकनीक, कौशल और उद्यमिता को मजबूत करके आत्मविश्वास के साथ विश्व से बराबरी करना है। 'लोकल से ग्लोबल' इसी भाव का नारा है। एमएसएमई, स्टार्टअप, विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था और रक्षा उत्पादन इसके स्तंभ हैं।


देश सेवा के इस महायात्रा में महिला सशक्तिकरण का स्वर भी बदला है। 'लखपति दीदी' की अवधारणा महिलाओं को निष्क्रिय लाभार्थी नहीं, आर्थिक गतिविधि की सक्रिय इकाई के रूप में देखती है। स्वयं सहायता समूह उन्हें उद्यम से जोड़ते हैं और महिला आरक्षण राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाता है। तीन तलाक की कुप्रथा के अंत ने भी करोड़ों महिलाओं के जीवन को नया आयाम दिया। जब महिला आय के साथ निर्णयों में भी हिस्सेदार बनती है, तो बदलाव की गति कई गुना बढ़ जाती है, यो मोदी जी ने सिद्ध किया है।

हमारे गाँव सदा चुनावी वादों के केंद्र रहे, लेकिन सच्ची सुध किसी ने नहीं ली। पहली बार 'स्वामित्व' योजना ने ड्रोन सर्वेक्षण और संपत्ति कार्ड के जरिए परिवारों को उनकी संपत्ति का स्पष्ट रिकॉर्ड दिया। यह कागज़ का टुकड़ा भर नहीं, आर्थिक सुरक्षा, ऋण की संभावना और अगली पीढ़ी की नींव है। जल मोदी जी के सुशासन का एक और सूत्र है। नर्मदा का पानी कच्छ तक पहुँचाने की कहानी हो या बुंदेलखंड की प्यास बुझाने वाली केन-बेतवा परियोजना, दोनों में जल-सुरक्षा और विकास का गहरा रिश्ता दिखता है।

ढाई दशक की महायात्रा का एक पक्ष सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का भी है। स्वतंत्रता के बाद तुष्टिकरण की राजनीति के कारण अनेक श्रद्धा केंद्र विकास की राह ताकते रहे। मोदी युग में उनकी तस्वीर बदली। श्रीराम मंदिर का दशकों पुराना स्वप्न साकार हुआ और अयोध्या विश्वस्तरीय नगर के रूप में आकार ले चुकी है। केदारनाथ का कायाकल्प हुआ, चारधाम यात्रा सुगम हुई और काशी की संकरी गलियों में विश्वनाथ धाम कॉरिडोर जैसी कल्पनातीत परियोजना मूर्त हुई। सोमनाथ, पावागढ़, मोढेरा और उज्जैन के महाकाल लोक तक यही कड़ी दिखती है। इन स्थलों पर केवल मंदिर परिसर नहीं सँवरे, सड़क, हवाई अड्डे, पर्यटन और रोजगार की संभावनाएँ भी खुलीं। आध्यात्म-संस्कृति के नए सवेरे के साथ विकास की नई गंगा प्रवाहित हुई। यही नहीं, अबूधाबी के भव्य मंदिर से बहरीन के श्रीनाथजी मंदिर तक, विदेशों में भी भारतीय आस्था को सम्मान मिला।

राष्ट्र-सेवा की आधारशिला केवल आर्थिक प्रगति नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा भी है, और इसकी कुंजी रक्षा में आत्मनिर्भरता है। स्वदेशी रक्षा कवच, ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें और अंतरिक्ष तकनीक भारत की सामरिक शक्ति के प्रतीक हैं। आतंकवाद के विरुद्ध कठोर रुख, बालाकोट एयर स्ट्राइक, अभिनंदन की बिना शर्त वापसी और डोकलाम की दृढ़ता के साथ विश्व शक्तियों की आँख में आँख डालकर धारा 370 की विदाई ने भारत के बदले तेवर का एहसास कराया। नक्सलवाद ने दशकों तक वनांचलों को विकास से वंचित रखा। आज सुरक्षा बलों की सटीक कार्रवाई और आत्मसमर्पण-पुनर्वास नीति के साथ सड़क, संचार, स्कूल और स्वास्थ्य सेवाएँ इन क्षेत्रों तक पहुँच रही हैं। आंतरिक मोर्चे पर नक्सल प्रभावित जिले 2014 के 126 से घटकर 2 रह गए हैं और सर्वाधिक प्रभावित जिले शून्य हो गए हैं। बस्तर के लगभग 70 सुरक्षा कैंप अब सेवा केंद्रों में बदले जाएंगे, जो सुरक्षा और विकास के परस्पर पूरक होने का प्रमाण है।

मोदी की देश सेवा के 25 वर्षों का एक उल्लेखनीय पक्ष भारत की बढ़ी हुई वैश्विक भूमिका है। G20 की अध्यक्षता और हाल के ब्रिक्स सम्मेलन ने भारत को वैश्विक विमर्श की अग्रिम पंक्ति में स्थापित किया। आज भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था भी। कोविड संकट में जब बड़ी शक्तियाँ सहम गईं, तब मोदी जी के नेतृत्व में भारत ने अपने नागरिकों को निःशुल्क टीका दिया और अनेक देशों तक वैक्सीन पहुँचाकर 'वसुधैव कुटुम्बकम्' को व्यवहार में उतारा। आज ग्लोबल साउथ की आवाज़ और डिजिटल अवसंरचना से भारत वैश्विक व्यवस्था का हिस्सा नहीं, उसका निर्माता बन रहा है।

कर्मयोगी नरेंद्र मोदी की यह यात्रा केवल बीते 25 वर्षों की कहानी नहीं, आने वाले 25 वर्षों का संकल्प है। गरीब कल्याण से आर्थिक सशक्तीकरण तक, स्ट्रीट वेंडर से विश्वकर्मा तक, लखपति दीदी से महिला प्रतिनिधित्व तक, स्वामित्व से संपत्ति के अधिकार तक और आस्था के पुनरुद्धार से वैश्विक नेतृत्व तक, हर कड़ी में एक ही सूत्र पिरोया है- शासन को समाज की वास्तविक जरूरतों से जोड़ना। मोदी जी की जनसेवा-यात्रा हमें सिखाती है कि जब सेवा कर्म बने, कर्म सुशासन से जुड़े और सुशासन समाज को सशक्त करे, तभी परिवर्तन स्थायी होता है। गुजरात से आरंभ हुई यह महायात्रा आज विकसित भारत के संकल्प तक पहुँची है, जो 2047 में अवश्य पूर्ण होगी।

- लेखक राष्ट्रीय संयोजक प्रकोष्ठ संकुल भाजपा एवं खजुराहो लोकसभा से सांसद हैं