MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सुनवाई का मौका दिए बिना ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकती सरकार

ध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी ठेकेदार को उचित सुनवाई और कारण बताओ नोटिस दिए बिना ब्लैकलिस्ट नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने ब्लैकलिस्टिंग को गंभीर नागरिक परिणाम वाली कार्रवाई बताया।

MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सुनवाई का मौका दिए बिना ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट नहीं कर सकती सरकार

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ठेकेदारों की ब्लैकलिस्टिंग को लेकर अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी ठेकेदार को उचित सुनवाई का अवसर दिए बिना ब्लैकलिस्ट नहीं किया जा सकता. हाईकोर्ट ने कहा कि ब्लैकलिस्टिंग का आदेश किसी कंपनी या ठेकेदार के लिए 'सिविल डेथ' (नागरिक जीवन पर गंभीर असर) जैसा होता है, इसलिए ऐसा फैसला प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना नहीं लिया जा सकता.

क्या था मामला?

मामला एक ठेकेदार कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने से जुड़ा था. संबंधित विभाग ने कंपनी का अनुबंध समाप्त करने के साथ उसे पांच साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया और सुरक्षा राशि भी जब्त कर ली थी. कंपनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर ब्लैकलिस्टिंग के आदेश को चुनौती दी,.

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि ब्लैकलिस्टिंग का असर केवल एक ठेके तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इससे संबंधित कंपनी भविष्य में सरकारी टेंडरों में भाग लेने की पात्रता भी खो सकती है. इसलिए ऐसा आदेश जारी करने से पहले संबंधित पक्ष को स्पष्ट नोटिस देना और व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है. केवल अनुबंध समाप्त करना और ब्लैकलिस्ट करना एक जैसी कार्रवाई नहीं मानी जा सकती.

कोर्ट ने यह भी माना कि यदि ब्लैकलिस्टिंग के आदेश में पर्याप्त कारण दर्ज नहीं किए गए हैं या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ है, तो ऐसा आदेश न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं सकता.

'ब्लैकलिस्टिंग सिविल डेथ के समान'

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना उसके व्यवसाय और भविष्य के सरकारी कार्यों पर व्यापक प्रभाव डालता है. इसलिए यह एक गंभीर प्रशासनिक कार्रवाई है, जिसे बिना उचित प्रक्रिया अपनाए लागू नहीं किया जा सकता.

पहले भी दे चुका है हाईकोर्ट ऐसी टिप्पणी

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहले भी कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि ठेकेदारों की ब्लैकलिस्टिंग या पंजीयन निलंबन जैसी कार्रवाई के लिए अलग से कारण बताओ नोटिस और सुनवाई जरूरी है. साथ ही कोर्ट यह भी कह चुका है कि ब्लैकलिस्टिंग की अवधि तर्कसंगत और निर्धारित होनी चाहिए.