संसद मार्च में महिला सुरक्षा पर उठे गंभीर सवाल, आखिर बेटियां किस पर करें भरोसा?
21 जुलाई के संसद मार्च के दौरान हमारे सामने आए वीडियो ने दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा और पुलिस की कार्यप्रणाली पर खड़े किए कई बड़े सवाल
नई दिल्ली. 21 जुलाई को CJP के नेतृत्व में आयोजित संसद मार्च का उद्देश्य छात्रों की मांगों को सरकार तक पहुंचाना था. इस प्रदर्शन में देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं शामिल हुए. हालांकि दिन चढ़ने के साथ प्रदर्शन हिंसक टकराव में बदल गया और राजधानी की सड़कों पर जो कुछ हमने देखा, उसने केवल कानून-व्यवस्था ही नहीं, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर बहस छेड़ दी.
प्रदर्शन के दौरान हमारे सामने कई ऐसे वीडियो आए, जिन्होंने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है. एक वीडियो में हमने देखा कि महिला प्रदर्शनकारी को पुलिसकर्मी सड़क पर घसीटते नजर आए. दूसरे वीडियो में दो पुलिसकर्मी एक महिला के बेहद करीब दिखाई दिए और उनका व्यवहार सवाल खड़े करता नजर आया. वहीं एक अन्य वीडियो में एक छोटी बच्ची को लाठी लगने का दृश्य भी सामने आया. इन सभी घटनाओं ने हमें यह सोचने पर मजबूर किया कि यदि विरोध प्रदर्शन के दौरान ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, तो महिलाओं का सुरक्षा को लेकर भरोसा कैसे मजबूत होगा.
The Delhi Police intentionally attacked the private parts of girls, this is a shameful act by the police.
— The Dalit Voice (@ambedkariteIND) July 21, 2026
Responsible police officer should be dismissed. pic.twitter.com/1g1gtCXgYQ
हमने जो तस्वीरें देखीं, उनमें सबसे बड़ा सवाल यही था कि यदि किसी विरोध प्रदर्शन के दौरान महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं, तो आम परिस्थितियों में उनकी सुरक्षा का भरोसा कैसे कायम होगा. दिल्ली देश की राजधानी है, जहां महिला सुरक्षा सवाल उठे है. ऐसे में यदि महिलाओं से जुड़े ऐसे दृश्य सामने आते हैं, तो यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था पर उठता गंभीर सवाल है.
Dev Kotak, a reporter with Times now, was attacked by a mob of protesters at Jantar Mantar in New Delhi. This is absolutely disgraceful. You can request a reporter to leave the spot if you don't want him/her around but resorting to violence is absolutely unjustified. pic.twitter.com/wCsTEswJ8t
— Piyush Rai (@Benarasiyaa) July 21, 2026
हालांकि हमने इस प्रदर्शन का दूसरा पक्ष भी देखा. कई वीडियो में प्रदर्शनकारियों द्वारा मीडिया कर्मियों के साथ धक्का-मुक्की और बदसलूकी होती दिखाई दी. एक महिला पत्रकार के साथ अभद्र व्यवहार की तस्वीरें भी सामने आईं. वहीं कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़पें हुईं. हमने ऐसे वीडियो भी देखे, जिनमें सीआरपीएफ और दिल्ली पुलिस के जवानों के साथ मारपीट होती नजर आई. इससे साफ था कि हिंसा किसी एक पक्ष तक सीमित नहीं रही.
ये वीडियो अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का नहीं है बल्कि ये तालिबानी संस्कृति दिल्ली में “तथाकथित आंदोलनकारियों” की है.. विपक्ष के नेताओं को इससे फर्क नहीं पड़ता है ? एक बेटी अपना काम कर रही है और उसके साथ पाशविक और राक्षसी कृत्य करनेवाले भेड़िए! पुलिस को कठोरतम कार्रवाई करनी चाहिए । pic.twitter.com/inv1FeifPN
— Devendra Parashar (@DParashar17) July 22, 2026
इन घटनाओं ने हमें यह महसूस कराया कि जब कोई आंदोलन हिंसक मोड़ लेता है, तो सबसे ज्यादा कीमत वही छात्र चुकाते हैं जो अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं. इस संसद मार्च में भी बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं पुलिस कार्रवाई और हिंसा के बीच फंस गए. वहीं आंदोलन की अगुवाई कर रहे अभिजीत दीपके, विजेता दहिया और सौरभ जैसे छात्र नेताओं की मौजूदगी के बीच सबसे अधिक चोट और परेशानी आम छात्रों को झेलनी पड़ी.

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन हमने जो दृश्य देखे, उन्होंने यह भी बताया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों और प्रदर्शनकारियों दोनों की जिम्मेदारी समान रूप से महत्वपूर्ण है. यदि कहीं पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया है तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए. वहीं यदि प्रदर्शनकारियों ने मीडिया कर्मियों, सुरक्षा बलों या सार्वजनिक संपत्ति पर हमला किया है, तो उसके लिए भी कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए.
लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल महिला सुरक्षा का है. हमने जो वीडियो देखे और जिन तस्वीरों ने पूरे देश का ध्यान खींचा, उन्होंने यह सोचने पर मजबूर किया कि किसी भी लोकतंत्र में महिलाओं की सुरक्षा सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. चाहे वह छात्रा हो, पत्रकार हो या आम नागरिक. यदि किसी विरोध प्रदर्शन के दौरान ही महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस करें, तो यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र के लिए चेतावनी है. हमारी नजर में इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय होना उतना ही जरूरी है, जितना महिलाओं का सुरक्षा पर भरोसा बनाए रखना.
Anubhav Dubey 
