Janmashtami Vrat Niyam : जन्माष्टमी व्रत के क्या है नियम? जानिए पूजा विधि, मंत्र और खास मान्यताएं
Janmashtami Vrat Niyam : मान्यता के अनुसार जन्माष्टमी का व्रत ब्रह्म मुहूर्त से शुरू किया जाता है। अगले दिन स्नान और पूजा के बाद भगवान को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है।
Janmashtami 2026 Vrat Niyam : लाइफस्टाइल डेस्क। देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रात के आठवें मुहूर्त में हुआ था। इसलिए जन्मोत्सव आधी रात को मनाने की परंपरा है। इस दौरान भक्त व्रत रखते हैं और विशेष पूजा करते हैं। रात में पूजा नहीं कर पाने वाले लोग अष्टमी तिथि में भी पूजा कर सकते हैं।
ब्रह्म मुहूर्त से शुरू होता है व्रत
मान्यता के अनुसार जन्माष्टमी का व्रत ब्रह्म मुहूर्त से शुरू किया जाता है। अगले दिन स्नान और पूजा के बाद भगवान को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इसके साथ व्रत पूरा किया जाता है। व्रत में अन्न का सेवन नहीं किया जाता। फल, दूध, सूखे मेवे और जरूरत के अनुसार फलाहार लिया जा सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए कठोर व्रत जरूरी नहीं माना जाता।
ऐसे करें श्रीकृष्ण की पूजा
पूजा के लिए जल, दूध, पंचामृत, अक्षत, चंदन, फूल, तुलसी, फल, मिठाई, माखन-मिश्री और धूप-दीप रखें। भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके मूर्ति पर अक्षत और फूल चढ़ाएं। जल, दूध और पंचामृत से अभिषेक करें। इसके बाद चंदन, जनेऊ, वस्त्र, आभूषण और फूल अर्पित करें। माखन-मिश्री और मिठाई का भोग लगाएं। चंद्रमा को अर्घ्य देकर कपूर से आरती करें।
पूजा में पढ़ें ये मंत्र
श्रीकृष्ण पूजा के दौरान श्रद्धा से मंत्रों का जाप किया जाता है। इनमें ‘ॐ श्रीकृष्णाय नमः’, ‘ॐ अच्युताय नमः’, ‘ॐ अनंताय नमः’, ‘ॐ माधवाय नमः’ और ‘ॐ गोविंदाय नमः’ प्रमुख हैं। पूजा के बाद प्रसाद बांटने और भजन-कीर्तन करने की भी परंपरा है।
गर्गाचार्य ने रखा था कृष्ण नाम
धार्मिक कथा के अनुसार कान्हा का नामकरण गर्गाचार्य ने किया था। नंद बाबा ने कंस से बालक की पहचान छिपाने के लिए गुप्त रूप से नामकरण संस्कार कराया था। कथा के अनुसार बालक का वर्ण श्याम था। इसी आधार पर उनका नाम कृष्ण रखा गया। इसी संस्कार में बलराम के लिए राम, बल और संकर्षण नाम बताए जाने की भी मान्यता है।
मोरपंख और कौस्तुभ मणि की मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार वृंदावन में कृष्ण की बांसुरी सुनकर मोर उनके आसपास नृत्य करते थे। प्रसन्न होकर मोरों ने उन्हें अपने पंख भेंट किए। कृष्ण ने उनमें से एक पंख अपनी पगड़ी में लगा लिया। वहीं कौस्तुभ मणि को समुद्र मंथन से निकली दिव्य मणि माना जाता है। धार्मिक कथा के अनुसार कृष्ण के विष्णु रूप में जन्म के समय यह मणि उनके वक्षस्थल पर थी।

