101 साल पहले अंग्रेजी हुकूमत को दिया था बड़ा झटका, काकोरी की पटरी पर गूंजी थी क्रांति की हुंकार
काकोरी ट्रेन एक्शन की 101वीं वर्षगांठ पर जानिए 9 अगस्त 1925 की उस ऐतिहासिक घटना की कहानी, जब राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और अन्य क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सरकार का खजाना कब्जे में लेकर ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती दी थी।
101 साल पहले अंग्रेजी हुकूमत को दिया था बड़ा झटका, काकोरी की पटरी पर गूंजी थी क्रांति की हुंकार
9 अगस्त 1925 को क्रांतिकारियों ने काकोरी के पास रोकी थी ट्रेन, सरकारी खजाना कब्जे में लेकर ब्रिटिश हुकूमत को दी थी खुली चुनौती
लखनऊ। 9 अगस्त का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक ऐसी क्रांतिकारी घटना की याद दिलाता है, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नींव को हिला दिया था। आज से ठीक 101 साल पहले, 9 अगस्त 1925 को लखनऊ के पास काकोरी में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी सरकार का खजाना ले जा रही ट्रेन को रोककर ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती दी थी। इतिहास में यह घटना ‘काकोरी ट्रेन एक्शन’ के नाम से दर्ज है।
ट्रेन रुकी और शुरू हुई इतिहास बदल देने वाली कार्रवाई
9 अगस्त 1925 की शाम सहारनपुर से लखनऊ जा रही ट्रेन काकोरी के पास पहुंची। इसी दौरान क्रांतिकारियों ने ट्रेन की चेन खींचकर उसे रोक दिया। उनका निशाना यात्रियों का सामान नहीं, बल्कि अंग्रेजी सरकार का वह सरकारी खजाना था, जिसे ट्रेन से ले जाया जा रहा था।
क्रांतिकारियों ने सरकारी धन पर कब्जा किया और वहां से निकल गए। इस कार्रवाई के पीछे मकसद व्यक्तिगत संपत्ति हासिल करना नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी आंदोलन के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना था।
बिस्मिल और अशफाक की दोस्ती बनी मिसाल
काकोरी ट्रेन एक्शन में राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां जैसे क्रांतिकारियों की भूमिका ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। अलग-अलग धर्मों और पृष्ठभूमि से आने वाले इन युवाओं की दोस्ती और देश के लिए बलिदान आज भी हिंदू-मुस्लिम एकता और राष्ट्रभक्ति की मिसाल के तौर पर याद किया जाता है।
इस क्रांतिकारी दल में राजेंद्र लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद, मन्मथनाथ गुप्त और अन्य क्रांतिकारी भी जुड़े थे।
अंग्रेजों ने शुरू किया बड़ा दमन
काकोरी की घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने क्रांतिकारियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। गिरफ्तारियां हुईं, मुकदमे चले और कई क्रांतिकारियों को कठोर सजा दी गई।
राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी और रोशन सिंह को फांसी की सजा दी गई। इन क्रांतिकारियों ने मौत के सामने भी अपने इरादे नहीं बदले।
101 साल बाद भी जिंदा है काकोरी की कहानी
आज काकोरी ट्रेन एक्शन की 101वीं वर्षगांठ पर यह घटना सिर्फ इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि उस दौर के युवाओं के साहस, त्याग और आजादी के जुनून की कहानी है।
काकोरी की वह पटरी आज भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर की गवाही देती है, जब कुछ युवा क्रांतिकारियों ने हथियार और सीमित संसाधनों के बावजूद दुनिया की सबसे बड़ी औपनिवेशिक ताकतों में से एक को चुनौती देने का साहस किया था।
9 अगस्त 1925 की वह शाम इतिहास में हमेशा याद रखी जाएगी—जब एक ट्रेन रुकी थी, लेकिन उसके साथ भारत की आजादी की लड़ाई की रफ्तार और तेज हो गई थी।

