E20 ईंधन से गाड़ियों को नुकसान! सलाहकार बोले- E10 पेट्रोल फिर शुरू करो, 30% एथेनॉल से खाद्य संकट का खतरा
सरकार के CEA वी. अनंत नागेश्वरन का कहना है कि E20 पेट्रोल से गाड़ियों में नुकसान हो रहा है। पुराने टू-व्हीलर्स के लिए E10 पेट्रोल की बिक्री फिर से शुरू की जानी चाहिए।
E20 Fuel Risk : नई दिल्ली। भारत ने पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य समय से पहले हासिल करके कच्चे तेल के आयात पर होने वाले अरबों रुपए तो बचा लिए, लेकिन अब एक नया संकट खड़ा हो रहा है। एथेनॉल की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए गन्ना, मक्का और चावल जैसी खाद्य फसलों को बड़े पैमाने पर एथेनॉल फैक्ट्रियों में भेजा जा रहा है। यह बात मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने एक निजी पेपर में छपे अपने आर्टिकल में कही है।
उन्होंने आगे कहा कि, मक्के का मुख्य इस्तेमाल पोल्ट्री और पशुओं के चारे में होता है। अगर एथेनॉल बनाने वाली कंपनियां ज्यादा दाम देकर मक्का खरीदने लगेंगी, तो पोल्ट्री और डेयरी इंडस्ट्री के लिए चारा महंगा हो जाएगा। नतीजा यह होगा कि अंडे, चिकन और दूध के दाम बढ़ेंगे, जिससे सीधे तौर पर खाद्य महंगाई को बढ़ावा मिलेगा। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने बताया कि, अगर सरकार पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा 20% से बढ़ाकर 30% करती है तो खाद्य संकट पैदा हो सकता है।
पुराने टू-व्हीलर्स के लिए E10 का विकल्प जरूरी
नागेश्वरन के मुताबिक देश में बड़ी संख्या में पुराने बाइक और स्कूटर चल रहे हैं। इनमें पुराने इंजन और ईंधन प्रणाली का इस्तेमाल होता है। उनका तर्क है कि ऐसे वाहनों के लिए E10 उपलब्ध रहने से उपभोक्ताओं को राहत मिल सकती है। उन्होंने यह सुझाव तब तक देने की बात कही है, जब तक पुराने वाहनों को E20 के अनुरूप बनाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती।
एथेनॉल की बढ़ती मांग से खाद्य फसलों पर दबाव
एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने, मक्के और चावल जैसे कच्चे माल का इस्तेमाल होता है। नागेश्वरन ने चिंता जताई है कि अगर ईंधन के लिए खाद्य फसलों की मांग तेजी से बढ़ती है, तो इसका असर पशु और पोल्ट्री चारे की कीमतों पर पड़ सकता है। इससे दूध, अंडे और चिकन जैसे उत्पाद महंगे होने का जोखिम बढ़ सकता है।
20 फीसदी से आगे बढ़ने पर सावधानी की जरूरत
नागेश्वरन का मानना है कि E20 के बाद एथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने से पहले संसाधनों का सही आकलन होना चाहिए। खासकर पानी, जमीन और कृषि उत्पादन पर पड़ने वाले असर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गन्ने की खेती में बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। इसलिए एथेनॉल नीति को केवल पेट्रोल और आयात बचत के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
सरकार का रुख E20 के पक्ष में
केंद्र सरकार ने E20 को सुरक्षित और वैज्ञानिक परीक्षणों से प्रमाणित ईंधन बताया है। सरकार के अनुसार E20 से कुछ वाहनों में ईंधन दक्षता 3 से 5 फीसदी तक प्रभावित हो सकती है, लेकिन इससे बड़े पैमाने पर इंजन नुकसान के प्रमाण नहीं मिले हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि E10 और E20 को देशभर में अलग-अलग उपलब्ध कराना लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन के लिहाज से काफी महंगा और जटिल होगा।
एथेनॉल से देश को आर्थिक फायदा भी
भारत ने पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की मात्रा पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ाई है। सरकार का कहना है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटती है। किसानों को एथेनॉल उत्पादन के लिए फसलों का बेहतर बाजार भी मिलता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2025-26 में जून तक औसत एथेनॉल ब्लेंडिंग 20 फीसदी तक पहुंच गई थी।
आगे की राह में संतुलन सबसे जरूरी
E20 को लेकर बहस अब केवल वाहन के माइलेज तक सीमित नहीं है। इसमें किसानों की आय, खाद्य महंगाई, पानी की उपलब्धता और ऊर्जा सुरक्षा भी शामिल हैं। नागेश्वरन का सुझाव E20 नीति को खत्म करने के बजाय उसके अगले चरण में सावधानी बरतने पर केंद्रित है। ऐसे में आने वाले समय में सरकार के सामने ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ता हित के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती होगी।

