मऊगंज और रीवा में कानून कायदों की अनदेखी,नहीं रुक रहा खनिज माफिया का अवैध कारोबार

मऊगंज और रीवा के जंगली क्षेत्रों में अवैध खनन और स्टोन क्रेशर से प्रदूषण बढ़ा, ग्रामीण दमा-टीबी जैसी बीमारियों से परेशान, पलायन को मजबूर.

मऊगंज और रीवा में कानून कायदों की अनदेखी,नहीं रुक रहा खनिज माफिया का अवैध कारोबार

राजेंद्र पयासी मऊगंज

मध्यप्रदेश के मऊगंज और रीवा जिले के जंगली इलाकों में खनिज माफिया का अवैध कारोबार लगातार बढ़ता जा रहा है. प्रशासन से की गई कार्रवाइयों के बावजूद जंगलों में पत्थर की अवैध खुदाई, ब्लास्टिंग और क्रेशर संचालन धड़ल्ले से जारी है. मऊगंज जिले के सीतापुर, बहेराडाबर, हर्रहा, सरदमन, जड़कुड़, पिपराही, लोढ़ी, हनुमना, गौरी, वसिगड़ा, नईगढ़ी और शिवराजपुर जैसे क्षेत्रों में खनिज माफिया खुलेआम प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे हैं. वहीं रीवा जिले के त्योंथर क्षेत्र अंतर्गत महेवा जंगल में भी अवैध उत्खनन, क्रेशर और हैवी ब्लास्टिंग से स्थानीय लोगों का जीवन दूभर हो गया है.

खनिज माफिया द्वारा की जा रही भारी ब्लास्टिंग के कारण आसपास रहने वाले लोगों पर 24 घंटे खतरा मंडरा रहा है. इतना ही नहीं, जंगलों में रहने वाले वन्यजीव भी अपना आशियाना छोड़कर गांवों की ओर पलायन कर रहे हैं.

प्रदूषण से बिगड़े हालात

इन क्षेत्रों में दिन-रात संचालित हो रहे स्टोन क्रेशर और खदानों के कारण वातावरण पूरी तरह प्रदूषित हो चुका है. मऊगंज के हर्रहा, पिपराही, सरदमन, सीतापुर, लोढ़ी और रीवा के महेवा क्षेत्र की स्थिति बेहद चिंताजनक है. जो पत्थर कभी ग्रामीणों के लिए प्राकृतिक संपदा थे, वही अब उनके लिए अभिशाप बन गए हैं. क्रेशरों से उड़ने वाली जहरीली धूल के कारण लोग दमा, सांस और टीबी जैसी गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं.

जिम्मेदार कौन?

हालात इतने खराब हैं कि मऊगंज के दुधमनिया, मलकपुर, हर्रई गुजरान, केसरा पहाड़ और रीवा के महेवा क्षेत्र के कई परिवार पलायन करने को मजबूर हो चुके हैं. ग्रामीणों का आरोप है कि खनिज माफिया पूरी तरह बेलगाम हो चुके हैं. ब्लास्टिंग का कोई तय समय नहीं है. पत्थर सीधे घरों में गिरते हैंकई घर क्षतिग्रस्त हो चुके हैं. शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं. ग्रामीणों का कहना है कि "यहां के माफिया सरकार और कानून से भी ऊपर हो चुके हैं। अगर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो हमें गांव छोड़ना पड़ेगा. 

मऊगंज और रीवा के जंगलों में अवैध खनन अब सिर्फ पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि मानवीय संकट बन चुका है. यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह पूरा क्षेत्र गंभीर पारिस्थितिक और सामाजिक आपदा की चपेट में आ सकता है.