MP Rajya Sabha Election 2026: तीसरी सीट पर सस्पेंस, BJP का मेगा सोशल इंजीनियरिंग प्लान, कांग्रेस को अपनों का डर
मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव 2026 में तीसरी सीट को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच सियासी मुकाबला तेज हो गया है। जानिए कांतदेव सिंह, अरविंद भदौरिया, जॉर्ज कुरियन, लाल सिंह आर्य और रंजना बघेल समेत संभावित दावेदारों का पूरा राजनीतिक गणित।
भोपाल। मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों गर्मी सिर्फ मौसम की नहीं, बल्कि राज्यसभा चुनाव की भी है। 26 जून 2026 को राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। इनमें दो सीटें बीजेपी की हैं, जिन पर फिलहाल डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी और जॉर्ज कुरियन सांसद हैं, जबकि एक सीट कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह की है।
विधानसभा के मौजूदा गणित के हिसाब से बीजेपी दो सीटें आसानी से जीत सकती है, लेकिन तीसरी सीट को लेकर राजनीतिक सरगर्मी चरम पर है। कांग्रेस के पास अपने दम पर एक सीट निकालने लायक संख्या जरूर है, लेकिन पार्टी को विपक्ष से ज्यादा अपने विधायकों की एकजुटता की चिंता सता रही है। वहीं बीजेपी तीसरी सीट जीतकर दिल्ली नेतृत्व को बड़ा राजनीतिक संदेश देना चाहती है।
बीजेपी में सवर्ण चेहरे पर मंथन
बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, पिछले राज्यसभा चुनाव में पार्टी ने दलित, ओबीसी और महिला प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी थी, लेकिन इस बार पार्टी ठाकुर या ब्राह्मण चेहरे पर दांव लगाने पर विचार कर रही है।
इसी कड़ी में बीजेपी प्रदेश उपाध्यक्ष कांतदेव सिंह और पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया के नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं।
कांतदेव सिंह क्यों मजबूत दावेदार?
विंध्य क्षेत्र से आने वाले कांतदेव सिंह संगठन के मजबूत नेता माने जाते हैं। पंचायत प्रकोष्ठ से लेकर प्रदेश उपाध्यक्ष तक का लंबा संगठनात्मक अनुभव उनके पक्ष में माना जा रहा है। संघ और संगठन में उनकी मजबूत पकड़ बताई जाती है।
वे 2000 से 2003 तक बीजेपी पंचायत प्रकोष्ठ के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे। 2004 और 2015 में सिंगरौली जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। किसान मोर्चा में प्रदेश मंत्री रहने के बाद 13 जनवरी 2021 से बीजेपी प्रदेश उपाध्यक्ष हैं।
ऑपरेशन कमल से जुड़े रहे अरविंद भदौरिया
पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया का नाम भी चर्चा में बना हुआ है। 2020 में कमलनाथ सरकार गिराने वाले घटनाक्रम में उनकी अहम भूमिका मानी जाती है।
जब ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक 22 विधायक कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे, तब विधायकों को अलग-अलग स्थानों से बैंगलुरू पहुंचाने और वहां ठहराने की जिम्मेदारी भदौरिया के पास थी। सत्ता परिवर्तन के बाद उन्हें शिवराज सरकार में मंत्री बनाया गया था। हालांकि वे 2023 का विधानसभा चुनाव हार गए थे। अब चर्चा है कि पार्टी उन्हें राज्यसभा भेजकर राजनीतिक इनाम दे सकती है।
बीजेपी सामाजिक समीकरण भी साधने में जुटी
हालांकि बीजेपी सिर्फ सवर्ण चेहरे पर ही फोकस नहीं कर रही। पार्टी एससी-एसटी और क्षेत्रीय समीकरणों को भी साधने की रणनीति पर काम कर रही है।
चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में अनुसूचित जाति वोट बैंक को देखते हुए पूर्व मंत्री लाल सिंह आर्य का नाम भी चर्चा में है। वहीं आदिवासी वोट बैंक को साधने के लिए डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी को दोबारा मौका मिलने की संभावना जताई जा रही है।
मालवा क्षेत्र से आदिवासी महिला चेहरा देने के लिए पूर्व मंत्री रंजना बघेल का नाम भी सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
इसके अलावा केंद्रीय राज्यमंत्री जॉर्ज कुरियन की दोबारा वापसी की संभावना भी बनी हुई है। 1980 से पार्टी से जुड़े कुरियन को संगठन का भरोसेमंद चेहरा माना जाता है। वे फिलहाल मत्स्य पालन, पशुपालन और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
तीसरी सीट का गणित क्यों दिलचस्प?
राज्यसभा चुनाव का मतदान सामान्य चुनावों से अलग होता है। इसमें न गुप्त मतदान होता है और न ही ईवीएम का इस्तेमाल। विधायक बैलेट पेपर पर उम्मीदवारों को वरीयता के आधार पर नंबर देते हैं।
इस चुनाव में जीत के लिए जरूरी वोटों की संख्या पहले से तय होती है। इसके लिए एक फॉर्मूला लागू होता है, जिसमें कुल विधायकों की संख्या को 100 से गुणा कर राज्यसभा सीटों की संख्या में एक जोड़कर उससे भाग दिया जाता है। इसके बाद प्राप्त संख्या में एक जोड़ने पर जीत का आंकड़ा तय होता है।
यही वजह है कि एक विधायक का इधर-उधर होना भी पूरे समीकरण को बदल सकता है। ऐसे में बीजेपी और कांग्रेस दोनों की नजर सिर्फ अपने विधायकों पर नहीं, बल्कि दूसरे दलों और संभावित क्रॉस वोटिंग पर भी टिकी हुई है।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती
कांग्रेस के पास गणित तो है, लेकिन पार्टी को अपने विधायकों की एकजुटता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। बीजेपी की रणनीति तीसरी सीट को सिर्फ चुनावी जीत नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश और संगठनात्मक ताकत के प्रदर्शन के रूप में देखने की है। ऐसे में आने वाले दिनों में भोपाल से दिल्ली तक सियासी हलचल और तेज होने के संकेत हैं
shivendra 
