CM योगी ने फिर बदला भदोही का नाम, अब फिर होगा 'संत रविदास नगर', समझिए इसके पीछे का पूरा दलित गणित
योगी आदित्यनाथ ने भदोही जिले का नाम फिर से संत रविदास नगर करने का ऐलान किया। जानिए जिले के नाम बदलने का इतिहास, दलित राजनीति और 2027 चुनाव से जुड़ा पूरा सियासी गणित।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी हलचल तेज होने के साथ ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बड़ा ऐलान किया है. भदोही जिले का नाम एक बार फिर बदलकर 'संत रविदास नगर' किया जाएगा. यह घोषणा संत गुरु रविदास की 650वीं जयंती के मौके पर वाराणसी में आयोजित बीजेपी के 'समरसता संकल्प अभियान' के शुभारंभ के दौरान की गई. योगी आदित्यनाथ ने कहा कि समाजवादी पार्टी की सरकार ने संत रविदास के नाम पर बने जिले का नाम बदलकर "पाप" किया था. अब उनकी सरकार जिले को दोबारा संत रविदास नगर की पहचान दिलाएगी.
सपा पर साधा निशाना
मुख्यमंत्री योगी ने घोषणा के साथ समाजवादी पार्टी पर भी तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि सपा ने संत रविदास के सम्मान को ठेस पहुंचाई और दलित महापुरुषों के नाम पर बने संस्थानों के नाम बदलने का काम किया. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि सपा सरकार ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर बने कन्नौज मेडिकल कॉलेज का नाम भी बदल दिया था, जिसे बीजेपी सरकार ने दोबारा बहाल किया. योगी ने सपा पर समाज को बांटने की राजनीति करने का आरोप लगाते हुए बाबर और औरंगजेब को उसका आदर्श बताया.
तीसरी बार बदलेगा जिले का नाम
भदोही जिले का नाम अब तक तीन बार बदल चुका है।
- 30 जून 1994: मुलायम सिंह यादव सरकार ने वाराणसी से अलग कर भदोही जिले का गठन किया।
- 4 दिसंबर 1997: मायावती सरकार ने इसका नाम बदलकर संत रविदास नगर कर दिया।
- 6 दिसंबर 2014: अखिलेश यादव सरकार ने फिर इसका नाम भदोही कर दिया।
- अब 2026: योगी सरकार ने फिर से इसे संत रविदास नगर करने का फैसला लिया है।
दलित अस्मिता से जुड़ा रहा है मामला
भदोही का नाम बदलने का विवाद सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं रहा, बल्कि इसे हमेशा दलित अस्मिता से जोड़कर देखा गया। जब अखिलेश यादव सरकार ने संत रविदास नगर का नाम बदलकर भदोही किया था, तब बसपा प्रमुख मायावती ने इसे दलित संतों का अपमान बताया था। दरअसल, मायावती सरकार ने दलित महापुरुषों और समाज सुधारकों के नाम पर कई जिलों के नाम रखे थे। बाद में अखिलेश सरकार ने उन सभी जिलों के पुराने नाम बहाल कर दिए।
इनमें कांशीराम नगर, छत्रपति शाहूजी महाराज नगर, रमाबाई नगर, भीम नगर, प्रबुद्ध नगर, पंचशील नगर, ज्योतिबा फुले नगर और महामाया नगर जैसे जिले शामिल थे।
क्यों अहम है यह फैसला?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह फैसला सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की रणनीति भी है।
लोकसभा चुनाव में दलित वोटों का बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की ओर जाता दिखाई दिया। वहीं आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद भी दलित राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा चुके हैं। ऐसे में बीजेपी एक बार फिर दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटी है।
लोकसभा चुनाव से मिला था संदेश
उत्तर प्रदेश में दलित आबादी करीब 21 प्रतिशत मानी जाती है और राज्य की 403 विधानसभा सीटों में 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं।
2022 विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसके सहयोगियों ने आरक्षित सीटों पर शानदार प्रदर्शन किया था। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर बदली। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और चंद्रशेखर आजाद को दलित वोटों का अच्छा समर्थन मिला। फैजाबाद जैसी सामान्य सीट पर भी पासी समाज से आने वाले सपा नेता अवधेश प्रसाद की जीत ने बीजेपी को बड़ा राजनीतिक संदेश दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संविधान बदलने के विपक्ष के आरोपों का असर भी दलित मतदाताओं पर पड़ा, जिसके बाद बीजेपी अब नए सिरे से सामाजिक समीकरण साधने में जुटी है।
बीजेपी का 'कोर्स करेक्शन'
भदोही का नाम फिर से संत रविदास नगर करना बीजेपी की इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
हाल ही में योगी कैबिनेट ने डॉ. बीआर आंबेडकर मूर्ति विकास योजना को मंजूरी दी है। इसके तहत राज्य की सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में बाबा साहेब आंबेडकर की प्रतिमाओं का सौंदर्यीकरण और रखरखाव किया जाएगा। साथ ही सामाजिक न्याय से जुड़े महापुरुषों की प्रतिमाओं पर प्रतीकात्मक छत्र भी लगाए जाएंगे।
यूपी से पंजाब तक नजर
संत रविदास सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी करोड़ों श्रद्धालुओं के आस्था के केंद्र हैं।
ऐसे में माना जा रहा है कि बीजेपी संत रविदास के सम्मान से जुड़े मुद्दों को सिर्फ यूपी तक सीमित नहीं रखेगी, बल्कि अन्य राज्यों में भी इसे राजनीतिक और सामाजिक संदेश के तौर पर आगे बढ़ाएगी।
क्या है राजनीतिक संदेश?
भदोही का नाम फिर से संत रविदास नगर करना प्रशासनिक फैसले से ज्यादा राजनीतिक संदेश माना जा रहा है। एक ओर बीजेपी इसे दलित सम्मान और सामाजिक समरसता से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति बता रहा है। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव तक दलित राजनीति और संत रविदास के नाम पर सियासी घमासान और तेज होने की संभावना है।

