Mauganj में अवैध शराब का बड़ा खेल: थाने से 4 KM दूर महुआ शराब की भट्टियां, 5380 किलो लाहन बरामद

मऊगंज में हाथ भट्ठी महुआ शराब का कुटीर उद्योग, पुलिस की नाक के नीचे चल रहा था जहरीला खेल, आबकारी-कारोबारी गठजोड़, प्रेस नोट में छिपा रहे नाम, आबकारी के गणित ने ही खोल दी कथित मिलीभगत की पोल

Mauganj में अवैध शराब का बड़ा खेल: थाने से 4 KM दूर महुआ शराब की भट्टियां, 5380 किलो लाहन बरामद

मऊगंज से राजेंद्र पयासी की रिपोर्ट। 

बहुचर्चित सागर जहरीली शराब कांड में 22 मौतों के बाद पूरा प्रदेश हिल गया है। मुख्यमंत्री से लेकर मुख्य सचिव तक सख्त कार्रवाई के निर्देश दे रहे हैं, लेकिन मऊगंज जिले में आबकारी विभाग का सिस्टम आज भी कुंभकर्णी नींद में है। इसका सबसे बड़ा सबूत नईगढ़ी थाना क्षेत्र है।

थाने से महज 4 किलोमीटर दूर डिहिया हरिजन बस्ती में वर्षों से महुआ लाहन की सड़ांध और हाथ भट्ठी शराब की भट्टियां खुलेआम धधक रही थीं। ग्रामीणों के अनुसार, यहां रोजाना सैकड़ों लीटर अवैध शराब बनाई जाती थी और पूरे जिले में इसकी सप्लाई की जा रही थी, लेकिन स्थानीय पुलिस और आबकारी विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी।

शासन के भारी दबाव के बाद सोमवार को आबकारी वृत्त मऊगंज और चाकघाट की संयुक्त टीम ने कार्रवाई की। सहायक आबकारी आयुक्त, रीवा के निर्देशन में सहायक जिला आबकारी अधिकारी अखिलेश्वर सिंह ठाकुर और अजय श्रीवास्तव के नेतृत्व में मऊगंज जिले के नईगढ़ी थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम डिहिया हरिजन बस्ती और रीवा जिला क्षेत्र के चाकघाट स्थित मल्लाहनटोला वार्ड-10 और ग्राम चंदई में 17 ठिकानों पर एक साथ दबिश दी गई।

विभाग ने 5,380 किलोग्राम महुआ लाहन और 165 लीटर हाथ भट्ठी मदिरा जब्त कर नष्ट करने का दावा किया है। इसके साथ ही 5,66,350 रुपये की सामग्री जब्त किए जाने की बात कही गई है।

महुआ लाहन क्विंटलों में, शराब चंद लीटर में कैसे?

आबकारी विभाग द्वारा संयुक्त रूप से छापामार कार्रवाई की गई, लेकिन यही दावा अब विभाग के गले की फांस बन गया है। सवाल यह है कि लाहन क्विंटलों में और शराब लीटरों में कैसे?

आबकारी विभाग और अवैध कारोबार से जुड़े जानकारों के अनुसार, 100 किलो लाहन से करीब 30 से 40 लीटर कच्ची शराब तैयार होती है। इस हिसाब से 5,380 किलो लाहन से करीब 1,600 से 2,100 लीटर शराब बननी चाहिए थी, लेकिन मौके पर सिर्फ 165 लीटर शराब ही मिली।

हर ठिकाने से 320 से 460 किलो तक लाहन मिला, जबकि शराब की मात्रा महज 5 से 20 लीटर ही रही। यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर बाकी शराब कहां गई? क्या हजारों लीटर शराब पहले ही बाजार में खपा दी गई या फिर छापे की सूचना पहले ही कारोबारियों तक पहुंच गई और उन्होंने माल हटा लिया? यह स्थिति महज लापरवाही है या मिलीभगत का संकेत, यह जांच का विषय है।

सबसे बड़ा सवाल, प्रेस नोट में पूरा नाम क्यों नहीं?

आबकारी विभाग का पिछला इतिहास देखा जाए या वर्तमान दौर की स्थिति पर नजर दौड़ाई जाए, तो विभाग की कार्रवाई और प्रेस नोट को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं। आरोप है कि जिला प्रशासन और वरिष्ठ अधिकारियों की आंखों में धूल झोंकने के लिए आबकारी विभाग सिर्फ उच्च अधिकारियों के निर्देश पर या किसी बड़ी घटना के बाद ही ऐसी दिखावटी कार्रवाई करता है। अन्यथा पूरे साल कार्रवाई लगभग शून्य रहती है।

और जब कार्रवाई होती भी है, तो प्रेस नोट में पकड़े गए कारोबारियों का पूरा नाम, पिता का नाम और स्पष्ट पता सार्वजनिक नहीं किया जाता। सिर्फ पहला नाम—जैसे संगीता, उर्मिला, पार्वती और रमेश—लिखकर इतिश्री कर ली जाती है। यहां तक कि सरनेम तक गायब कर दिया जाता है।

जबकि नियमानुसार प्रेस नोट में पूरा विवरण होना चाहिए, ताकि समाज के सामने यह स्पष्ट हो सके कि कौन व्यक्ति अवैध मादक पदार्थ के कारोबार में शामिल है। आधा-अधूरा नाम लिखने से कारोबारियों के हौसले बुलंद होने की आशंका रहती है। उन्हें पता होता है कि अखबार और सोशल मीडिया में नाम आएगा भी तो उनकी पूरी पहचान सामने नहीं आएगी और अंदर ही अंदर धंधा चलता रहेगा। इससे यह शक और गहराता है कि विभाग के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों और कारोबारियों के बीच अंदरखाने मिलीभगत हो सकती है। हालांकि, इसकी वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

जनता की प्रशासन से मांग

ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और आबकारी विभाग के उच्च अधिकारियों से मांग की है कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराई जाए। आबकारी विभाग के पिछले एक साल के प्रेस नोटों की जांच की जाए। साथ ही यह भी पता लगाया जाए कि डिहिया में वर्षों से चल रहे इस अवैध कारोबार को किसकी शह मिली हुई थी।

ग्रामीणों ने प्रेस नोट में आरोपियों के पूरे नाम और स्पष्ट विवरण सार्वजनिक करने की व्यवस्था सुनिश्चित करने की भी मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस मामले में सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो सागर जैसा हादसा मऊगंज में भी दोहराया जा सकता है और जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ कागजी खानापूर्ति करते रह जाएंगे।