नर्सिंग कांड की पूरी कहानी, 2022 से 2026 तक कैसे उलझता गया छात्रों का भविष्य!

2022 से शुरू हुआ मध्य प्रदेश का नर्सिंग कॉलेज विवाद 2026 तक छात्रों के भविष्य का संकट बन गया। CBI जांच में कई कॉलेज अनफिट पाए गए, कॉलेज बंद हुए और हजारों छात्रों की परीक्षाएं, रिजल्ट व डिग्री अटक गईं। 2026 में भी छात्र भोपाल की सड़कों पर अपने हक, परीक्षा, रिजल्ट और रजिस्ट्रेशन की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल—कॉलेज की गलती की सजा छात्र क्यों भुगतें?

नर्सिंग कांड की पूरी कहानी, 2022 से 2026 तक कैसे उलझता गया छात्रों का भविष्य!

भोपाल | विशेष रिपोर्ट 

मध्य प्रदेश का नर्सिंग कॉलेज मामला अब सिर्फ कॉलेजों की मान्यता, नियमों और कथित अनियमितताओं की जांच तक सीमित नहीं रह गया है। इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर उन विद्यार्थियों पर पड़ा है, जिन्होंने नर्स बनने का सपना लेकर कॉलेजों में दाखिला लिया, फीस जमा की और पढ़ाई शुरू की, लेकिन बाद में परीक्षा, रिजल्ट, डिग्री और रजिस्ट्रेशन जैसी बुनियादी चीजों के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़ा।

अगस्त 2026 में भी नर्सिंग छात्र भोपाल की सड़कों पर हैं। उनकी मांग है कि लंबित परीक्षाएं कराई जाएं, परिणाम जारी किए जाएं, डिग्री और रजिस्ट्रेशन दिए जाएं तथा कॉलेजों की कथित गड़बड़ियों की सजा विद्यार्थियों को न दी जाए। 17 अगस्त को छात्रों ने भोपाल में प्रदर्शन किया और 19 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास की ओर मार्च करने की कोशिश की।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह मामला शुरू कहां से हुआ? कितने कॉलेज जांच के दायरे में आए? कितने कॉलेज अयोग्य पाए गए? कितने कॉलेज बंद हुए? कितने छात्र प्रभावित हुए? और सबसे बड़ा सवाल—इन सबमें छात्रों की गलती आखिर क्या थी?

2022: नर्सिंग कॉलेजों की व्यवस्था पर पहली बड़ी चोट

मध्य प्रदेश नर्सिंग विवाद की कानूनी लड़ाई 2022 में हाईकोर्ट पहुंची। विशाल बघेल की दायर याचिका में प्रदेश में तेजी से बढ़ रहे नर्सिंग कॉलेजों की मान्यता, बुनियादी सुविधाओं, शिक्षकों और प्रशिक्षण व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए गए।

आरोप था कि कई संस्थानों में नर्सिंग शिक्षा के लिए जरूरी सुविधाएं नहीं थीं। कुछ कॉलेजों में भवन, लैब, लाइब्रेरी, पर्याप्त फैकल्टी और अस्पताल जैसी आवश्यक व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठे।

मामला गंभीर इसलिए था क्योंकि विद्यार्थी इन संस्थानों में बाकायदा प्रवेश ले रहे थे और फीस चुका रहे थे। अगर किसी कॉलेज की व्यवस्था नियमों के मुताबिक नहीं थी तो सबसे पहला सवाल यह था कि उसे मान्यता और प्रवेश की अनुमति आखिर किस प्रक्रिया के तहत मिली?

एक कॉलेज में एक शिक्षक, कई कॉलेजों में एक ही शिक्षक  —जांच में सामने आईं गड़बड़ियां

हाईकोर्ट की कार्यवाही के दौरान नर्सिंग कॉलेजों की व्यवस्था को लेकर कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। रिपोर्टों के अनुसार कुछ मामलों में एक ही व्यक्ति को कई कॉलेजों से जुड़ा हुआ बताया गया और कई कॉलेजों में आवश्यक बुनियादी सुविधाओं की कमी के आरोप सामने आए।

इसी दौरान यह सवाल भी उठा कि निरीक्षण करने वाली संस्थाओं ने इन कॉलेजों को मान्यता देने से पहले वास्तविक स्थिति की जांच किस तरह की।

यहीं से मामला केवल कॉलेज संचालकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मान्यता और निरीक्षण की पूरी व्यवस्था सवालों के घेरे में आ गई।

33 कॉलेजों से शुरू हुई जांच, फिर बढ़ता गया दायरा

मामले की गंभीरता बढ़ने के बाद CBI जांच का रास्ता खुला। शुरुआती चरण में 33 नर्सिंग संस्थानों की मान्यता में कथित अनियमितताओं की जांच की गई।

इसके बाद जांच का दायरा काफी बढ़ा और प्रदेश के सैकड़ों नर्सिंग कॉलेज जांच के घेरे में आए।

यहां से छात्रों की परेशानी और बढ़ने लगी, क्योंकि कॉलेजों की जांच और उनकी मान्यता की स्थिति स्पष्ट होने तक परीक्षा और शैक्षणिक प्रक्रिया प्रभावित होती गई।

2023 तक 1.25 लाख छात्रों की परीक्षाएं तक प्रभावित होने की रिपोर्ट

2023  की एक रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश के 375 नर्सिंग कॉलेजों में पढ़ने वाले 1.25 लाख से अधिक छात्रों की तीन साल तक परीक्षाएं नहीं हुई थीं।

रिपोर्ट में कहा गया था कि 2020-21 बैच के विद्यार्थी भी अपनी पहली वर्ष की परीक्षा का इंतजार कर रहे थे और 2020 के बाद प्रदेश में नए नर्सिंग स्टाफ की उपलब्धता भी प्रभावित हुई।

यह आंकड़ा पूरे नर्सिंग शिक्षा तंत्र पर पड़े असर को बताता है। इसे सीधे “घोटाले के दोषी या प्रभावित छात्र” की संख्या नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन इससे यह जरूर समझ आता है कि विवाद का असर कितने बड़े स्तर पर हुआ था।

364 कॉलेजों की जांच ने खोल दी व्यवस्था की परतें

इसके बाद हाईकोर्ट के निर्देश पर CBI को मध्य प्रदेश के नर्सिंग कॉलेजों की व्यापक जांच करनी पड़ी। एक प्रमुख चरण में 364 कॉलेजों की जांच का दायरा सामने आया।

CBI की जांच के बाद कॉलेजों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया। CBI रिपोर्ट के अनुसार 308 कॉलेजों की जांच में: 169 कॉलेज Suitable पाए गए।

74 कॉलेजों में Curable Deficiency यानी सुधार योग्य कमियां मिलीं।

65 कॉलेज Unsuitable पाए गए।

यानी उस चरण में जांचे गए 308 कॉलेजों में 139 कॉलेजों में किसी न किसी स्तर की कमी सामने आई।

लेकिन यह आंकड़ा पूरे मामले का अंतिम आंकड़ा नहीं है। बाद में जांच का दायरा और बढ़ा।

169 कॉलेजों की क्लीन चिट भी सवालों के घेरे में

मामले में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब CBI की जांच प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगे। कुछ CBI अधिकारियों और कॉलेज संचालकों के बीच कथित रिश्वतखोरी के आरोप सामने आए।

रिपोर्टों के अनुसार इस मामले में 4 CBI अधिकारियों समेत कई लोगों की गिरफ्तारी हुई।

FIR में जिन चार अधिकारियों का नाम सामने आया, उनमें:

आशीष प्रसाद — DSP, CBI

राहुल राज — Inspector, CBI

ऋषिकांत असाटे — MP Police Inspector, CBI में deputation

सुशील कुमार — MP Police अधिकारी, CBI में deputation  शामिल थे

इसके बाद उन कॉलेजों की जांच पर भी सवाल खड़े हुए जिन्हें पहले CBI की जांच में क्लीन चिट मिली थी। हाईकोर्ट ने पहले Suitable पाए गए 169 कॉलेजों की दोबारा जांच का आदेश दिया।

इस घटनाक्रम ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया, क्योंकि जिस जांच के आधार पर कॉलेजों की स्थिति तय होनी थी, उसकी निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े हो गए।

2024: 31 जिलों के 66 नर्सिंग कॉलेजों पर लगा ताला

मई 2024 में मध्य प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के निर्देश के बाद 31 जिलों के 66 नर्सिंग कॉलेजों को बंद करने की कार्रवाई शुरू की।

CBI जांच में इन कॉलेजों को अनफिट पाया गया था। सरकार ने इनकी मान्यता रद्द करने और संस्थानों को बंद करने की कार्रवाई की।

इन 66 कॉलेजों में सबसे ज्यादा कॉलेज बैतूल में थे। 66 बंद कॉलेजों में प्रमुख जिले

बैतूल – 8 भोपाल – 6 इंदौर – 5 छतरपुर – 4 धार – 4 सीहोर – 4 नर्मदापुरम – 3

इसके अलावा कई अन्य जिलों के कॉलेज भी सूची में शामिल थे।

सरकार ने उस समय स्पष्ट किया था कि इन कॉलेजों में पहले से पढ़ रहे छात्रों की परीक्षा की व्यवस्था की जाएगी और विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा।

लेकिन छात्रों की परेशानी यहीं खत्म नहीं हुई।

कॉलेज बंद हुआ, लेकिन छात्र कहां जाए?

यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण मानवीय पहलू है।

जिस कॉलेज में विद्यार्थी ने प्रवेश लिया, वह बाद में जांच में अयोग्य पाया गया। कॉलेज बंद हो गया। लेकिन विद्यार्थी ने तो अपनी फीस जमा कर दी थी, कक्षाएं की थीं और अपनी पढ़ाई पूरी करने की उम्मीद की थी।

छात्रों का सवाल सीधा था

अगर कॉलेज नियमों के मुताबिक नहीं था तो उसे मान्यता किसने दी?

अगर कॉलेज के पास पर्याप्त सुविधाएं नहीं थीं तो निरीक्षण किसने किया?

अगर कॉलेज अयोग्य था तो विद्यार्थियों को वहां प्रवेश क्यों दिया गया?

और सबसे महत्वपूर्ण—

कॉलेज की गलती की कीमत विद्यार्थी क्यों चुकाए?

परीक्षा रुकी तो डिग्री और नौकरी भी अटक गई

नर्सिंग छात्रों के लिए परीक्षा सिर्फ एक परीक्षा नहीं है। परीक्षा के बाद रिजल्ट आता है, रिजल्ट के बाद अगली कक्षा और अंततः डिग्री मिलती है। इसके बाद पेशेवर रजिस्ट्रेशन और नौकरी के अवसर खुलते हैं। जब परीक्षा वर्षों तक अटकती है तो पूरा करियर पीछे चला जाता है। कई छात्रों के लिए इसका मतलब है—

परीक्षा में देरी रिजल्ट में देरी डिग्री में देरी रजिस्ट्रेशन में देरी नौकरी में देरी।

अगली पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए भी यह देरी मुश्किल बनती है।

इसी वजह से 2026 में भी छात्र “परीक्षा और डिग्री” को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। 17 अगस्त 2026 को भोपाल में छात्रों ने वर्षों से चली आ रही अनिश्चितता के खिलाफ प्रदर्शन किया।

2026: करीब 30 हजार छात्रों के रिजल्ट का मामला हाईकोर्ट पहुंचा

अप्रैल 2026 में मामला फिर हाईकोर्ट के सामने आया। MP Nursing Council ने 2022-23 सत्र के प्रथम वर्ष GNM के करीब 30,000 छात्रों के रिजल्ट जारी करने की अनुमति मांगी।

हाईकोर्ट ने पहले पूरी जानकारी और रिकॉर्ड मांगे। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि जिन छात्रों ने अयोग्य घोषित कॉलेजों में पढ़ाई की, उन्हें पहले योग्य संस्थानों में स्थानांतरित क्यों नहीं किया गया।

अदालत ने विद्यार्थियों के हित को ध्यान में रखते हुए रिकॉर्ड और कॉलेजों की स्थिति स्पष्ट करने को कहा।

जून 2026: कुछ छात्रों के लिए परीक्षा और रिजल्ट का रास्ता खुला

20 जून 2026 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने योग्य घोषित नर्सिंग कॉलेजों में GNM तृतीय वर्ष की परीक्षा आयोजित करने की अनुमति दी।

साथ ही 2022-23 सत्र की GNM प्रथम वर्ष की परीक्षाओं के परिणाम घोषित करने की अनुमति भी दी गई। लेकिन अदालत ने अयोग्य घोषित कॉलेजों को परीक्षा में शामिल करने की अनुमति नहीं दी।

20 जून के हाईकोर्ट आदेश के बाद नर्सिंग छात्रों के लिए राहत का रास्ता खुला। इसके बाद अगस्त 2026 की सुनवाई में सरकार ने बताया कि अयोग्य घोषित कॉलेजों के 4,475 GNM छात्रों में से 2,395 छात्रों को योग्य कॉलेजों में स्थानांतरित किया जा चुका है। हाईकोर्ट ने इन 2,395 छात्रों के परीक्षा परिणाम जारी करने की अनुमति दे दी। शेष 2,080 छात्रों को भी योग्य कॉलेजों में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया बताई गई। यानी वर्षों से अटके छात्रों में कम से कम 2,395 विद्यार्थियों के लिए रिजल्ट का रास्ता अब खुल चुका है, जबकि 2,080 छात्रों का ट्रांसफर अभी बाकी है।

इसी सुनवाई में सामने आया कि CBI ने 695 नर्सिंग कॉलेजों की जांच की थी।

इनमें:

165 कॉलेज सीधे Fit पाए गए।

89 कॉलेजों ने कमियां दूर करने के बाद Fit का दर्जा हासिल किया।

बाकी कॉलेजों को Unfit घोषित कर बंद किया गया।

आज भी छात्र सड़क पर क्यों?

अगर इतने आदेश हो चुके हैं और कई कॉलेज बंद हो चुके हैं तो फिर अगस्त 2026 में छात्र आंदोलन क्यों कर रहे हैं?

क्योंकि छात्रों का कहना है कि कागज पर कार्रवाई और जमीन पर समाधान में अभी भी अंतर है।

उनकी मांगें हैं कि लंबित परीक्षाएं कराई जाएं, रिजल्ट समय पर दिए जाएं, डिग्री जारी हो, Nursing Council Registration मिले और जिन छात्रों की पढ़ाई कॉलेजों की स्थिति के कारण प्रभावित हुई है, उनके भविष्य के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनाई जाए।

17 अगस्त को भोपाल में छात्रों ने प्रदर्शन किया और 19 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास की ओर मार्च का प्रयास किया। रिपोर्टों के अनुसार पुलिस ने मार्च को रोका।

सबसे बड़ा सवाल: बच्चों की गलती क्या थी?

पूरे मामले को अगर एक सामान्य छात्र की नजर से देखें तो तस्वीर बहुत अलग दिखाई देती है।

एक विद्यार्थी ने नर्सिंग को करियर चुना। उसने कॉलेज में प्रवेश लिया। फीस जमा की। पढ़ाई की। परीक्षा की तैयारी की।

उसे यह जिम्मेदारी दी ही नहीं गई थी कि वह यह जांचे कि कॉलेज की लैब निर्धारित मानकों की है या नहीं।

उसे यह जांचने की विशेषज्ञता भी नहीं थी कि कॉलेज में नियुक्त शिक्षक वास्तव में निर्धारित मानकों के अनुसार हैं या नहीं।

और सबसे महत्वपूर्ण बात—कॉलेज को मान्यता देना और उसका निरीक्षण करना छात्र का काम नहीं था। यह काम नियामक संस्थाओं और संबंधित अधिकारियों का था।

इसलिए अगर किसी कॉलेज ने गलत जानकारी दी, अगर निरीक्षण में लापरवाही हुई या अगर मान्यता देने की प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई, तो उस जिम्मेदारी की जांच जरूरी है।

लेकिन उस प्रक्रिया में पढ़ रहे विद्यार्थियों को वर्षों तक परीक्षा और डिग्री के लिए इंतजार कराना कितना उचित है—यह सवाल आज भी सामने खड़ा है।

चार साल बाद भी अधूरा सवाल

2022 में जब नर्सिंग कॉलेजों की व्यवस्था पर सवाल उठा था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह विवाद विद्यार्थियों के लिए इतना लंबा इंतजार बन जाएगा।

जांच हुई।

CBI जांच हुई।

कॉलेजों की श्रेणी तय हुई।

कुछ कॉलेज Suitable पाए गए।

कुछ में सुधार की गुंजाइश बताई गई।

कई कॉलेज Unfit पाए गए।

66 कॉलेजों को बंद करने की कार्रवाई हुई।

कुछ कॉलेजों की दोबारा जांच हुई।

कोर्ट ने परीक्षा और रिजल्ट को लेकर कई आदेश दिए।

फिर भी अगस्त 2026 में छात्र सड़क पर हैं।

यह स्थिति सिर्फ एक शिक्षा विवाद नहीं है। यह उस व्यवस्था पर भी सवाल है जिसमें किसी संस्थान की मान्यता और निगरानी की जिम्मेदारी अलग-अलग सरकारी और नियामक संस्थाओं की होती है, लेकिन गलती सामने आने के बाद सबसे पहले उसका असर विद्यार्थी पर पड़ता है।

 दोषी कौन, यह अदालत तय करेगी;  भविष्य सरकार को तय करना होगा

नर्सिंग कॉलेजों को मान्यता देने वाली व्यवस्था में अब तक प्रत्यक्ष कार्रवाई के रिकॉर्ड में चार प्रमुख नाम सामने आये हैं —तत्कालीन रजिस्ट्रार सुनीता शिजू, पूर्व रजिस्ट्रार चंद्रकला डिगवैया, तत्कालीन रजिस्ट्रार अनीता चांद और तत्कालीन चेयरमैन डॉ. जितेन चंद्र शुक्ला। सुनीता शिजू और चंद्रकला डिगवैया को विभागीय कार्रवाई के बाद सेवा से बर्खास्त किया गया, जबकि अनीता चांद और डॉ. जितेन चंद्र शुक्ला को दिसंबर 2024 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर MPNRC के महत्वपूर्ण पदों से हटाया गया। इसके अलावा मान्यता देने वाली निरीक्षण समितियों के छह अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की

लेकिन एक बात निर्विवाद रूप से सामने आती है—विद्यार्थियों का समय वापस नहीं आ सकता।

जिस छात्र ने चार साल की पढ़ाई के बाद नौकरी शुरू करनी थी, वह अगर परीक्षा या डिग्री के इंतजार में बैठा है तो उसके लिए यह सिर्फ प्रशासनिक देरी नहीं है। यह उसके जीवन के महत्वपूर्ण वर्षों का सवाल है।

इसलिए सरकार और संबंधित नियामक संस्थाओं के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही होना चाहिए—

कॉलेज की गलती की सजा छात्र क्यों भुगते?