डर क्यों लगता है? शरीर में क्या होता है और खुद को शांत कैसे रखें, जानिए
डर लगने पर हमारा शरीर सर्वाइवल मोड में चला जाता है, जिससे दिल की धड़कन तेज होती है और घबराहट बढ़ जाती है। डॉक्टर बताते हैं कि लंबे समय तक डर बने रहने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है। जानिए डर क्यों लगता है, इसके नुकसान क्या हैं और खुद को शांत कैसे रखें।
डर हम सबको लगता है। कई सिचुएशन ऐसी होती हैं, जिनमें डर लगना स्वाभाविक है—जैसे रात में सोते समय कोई बुरा सपना देख लेना या अचानक लाइट चले जाना।
लेकिन क्या आपको पता है कि आखिर हमें डर क्यों लगता है? और जब डर लगता है तो हमारी बॉडी में क्या होता है? साथ ही, उस वक्त खुद को शांत रखने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
डॉक्टर बताते हैं कि जब हमें डर लगता है, तो हमारा शरीर सर्वाइवल मोड में चला जाता है। दिल की धड़कन और सांसें तेज हो जाती हैं, मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं, पसीना आने लगता है। दिमाग का अमिग्डाला हिस्सा अलार्म की तरह एक्टिव हो जाता है, जबकि सोचने वाला हिस्सा यानी प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पीछे चला जाता है।
इसी वजह से हम डर में जल्दी घबरा जाते हैं, ठीक से सोच नहीं पाते और कई बार इम्पल्सिव रिएक्शन दे देते हैं। यह शरीर का तरीका है हमें खतरे से बचाने का। खतरा न भी हो, तब भी शरीर वही प्रतिक्रिया देता है।
लंबे समय तक डर बने रहने से शरीर को होने वाले नुकसान
अगर डर या चिंता लंबे समय तक बनी रहे, तो शरीर और दिमाग थकने लगता है। नींद खराब हो जाती है, सिरदर्द, पेट की दिक्कत, थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है।
मेंटल लेवल पर एंग्जायटी, पैनिक अटैक और डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है। लगातार डर में रहने से इम्यून सिस्टम भी कमजोर हो जाता है, जिससे बार-बार बीमार पड़ने की संभावना बढ़ जाती है।
किस तरह के डर नॉर्मल हैं और डॉक्टर को कब दिखाना चाहिए
जब आप कोई नया काम करते हैं, परीक्षा देने जाते हैं, इंटरव्यू में जाते हैं या किसी अनजान स्थिति का पहली बार सामना करते हैं, तो डर लगना नॉर्मल है।
लेकिन अगर डर बिना वजह आए, बार-बार आए, महीनों या सालों तक बना रहे, और डर की वजह से आप बाहर जाना, काम करना या लोगों से बात करना बंद कर दें, तो यह नॉर्मल नहीं है।
अगर डर के साथ चक्कर आएं, तेज घबराहट या एंग्जायटी हो, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
डर को मैनेज कैसे करें?
सबसे पहले अपने डर को नाम दीजिए, उसे दबाइए नहीं।
धीमी और गहरी सांस लें। 4-6-8 ब्रीदिंग एक्सरसाइज करें—
4 सेकंड में सांस अंदर लें,
6 सेकंड तक सांस रोकें,
और 8 सेकंड में धीरे-धीरे सांस छोड़ें।
अपने दिमाग को याद दिलाएं कि आप सुरक्षित हैं।
कैफीन और चीनी का सेवन कम करें।
नींद और रूटीन को बेहतर रखें।
लेकिन अगर इन सबके बावजूद डर बना रहता है, तो जल्द से जल्द डॉक्टर से जरूर संपर्क करें।
ध्यान दें: यहां दी गई किसी भी जानकारी को अपनाने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
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