Musafir Cafe Review: दिव्य प्रकाश दुबे की किताब का जादू पर्दे पर चला या नहीं?

दिव्य प्रकाश दुबे के चर्चित उपन्यास पर बनी फिल्म का रिव्यू. जानिए कहानी, अभिनय, निर्देशन और क्या यह किताब के साथ न्याय कर पाई है.

Musafir Cafe Review: दिव्य प्रकाश दुबे की किताब का जादू पर्दे पर चला या नहीं?

दिव्य प्रकाश दुबे की Musafir Cafe उन उपन्यासों में से एक है जिसे पढ़ने के बाद उसके किरदार लंबे समय तक याद रहते हैं. यह सिर्फ एक लव स्टोरी नहीं, बल्कि रिश्तों, फैसलों और जिंदगी के बदलते दौर की कहानी है. अब इसी किताब को स्क्रीन पर उतारा गया है. अच्छी बात यह है कि मेकर्स ने कहानी को जरूरत से ज्यादा फिल्मी बनाने की कोशिश नहीं की. किताब की सादगी और भावनाओं को काफी हद तक बरकरार रखा गया है. हालांकि, किताब पढ़ चुके लोगों को कुछ हिस्से थोड़े छोटे और जल्दी खत्म होते हुए लग सकते हैं.

विक्रांत मैसी का अभिनय सबसे मजबूत कड़ी

अगर इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत किसी एक चीज को कहा जाए तो वह है विक्रांत मैसी का अभिनय. वह अपने किरदार को इतने सहज तरीके से निभाते हैं कि कई बार बिना कुछ बोले ही भावनाएं समझ आ जाती हैं. वेदिका पिंटो भी अपने रोल में अच्छी लगी हैं और दोनों की केमिस्ट्री कहानी को मजबूत बनाती है. फिल्म की सिनेमैटोग्राफी भी खूबसूरत है. हर फ्रेम कहानी के मूड के साथ चलता है और बैकग्राउंड म्यूजिक भी कहीं भी जबरदस्ती नहीं लगता.

देखनी चाहिए या नहीं?

अगर आपने Musafir Cafe का उपन्यास पढ़ा है, तो यह फिल्म आपको उस दुनिया में दोबारा ले जाने की कोशिश करती है. हां, किताब जितनी गहराई स्क्रीन पर लाना आसान नहीं था, लेकिन यह एडॉप्टेशन ईमानदार लगता है. वहीं अगर आपने किताब नहीं पढ़ी है और आपको रिश्तों पर बनी शांत और भावनात्मक कहानियां पसंद हैं, तो यह फिल्म आपको जरूर पसंद आ सकती है. लेकिन अगर आप तेज रफ्तार कहानी, बड़े ट्विस्ट और मसाला एंटरटेनमेंट की तलाश में हैं, तो यह फिल्म शायद आपके लिए नहीं है.