हीटवेव की चपेट में यूरोप: भीषण गर्मी से फ्रांस में हजार लोगों की मौत, 16 देशों में टूटा तापमान का रिकॉर्ड

यूरोप में भीषण हीटवेव का कहर: ब्रिटेन-जर्मनी समेत 16 देशों में रिकॉर्डतोड़ गर्मी, सड़कें पिघलीं, स्कूल बंद, जंगलों में आग और कई देशों में रेड अलर्ट

हीटवेव की चपेट में यूरोप: भीषण गर्मी से फ्रांस में हजार लोगों की मौत, 16 देशों में टूटा तापमान का रिकॉर्ड

यूरोप इन दिनों भीषण हीटवेव की चपेट में है। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली, ब्रिटेन, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, पुर्तगाल और अन्य देशों में रिकॉर्डतोड़ गर्मी ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। कई स्थानों पर तापमान दशकों पुराने रिकॉर्ड तोड़ चुका है।

भीषण गर्मी के कारण सड़कें पिघल रही हैं, जंगलों में आग फैल रही है, स्कूल बंद किए जा रहे हैं और रेल-बिजली सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक तापमान का सबसे अधिक असर बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों पर पड़ रहा है।

फ्रांस में गर्मी ने ली हजार लोगों की जान

फ्रांस की स्वास्थ्य एजेंसी के अनुसार, 24 जून से 27 जून के बीच भीषण गर्मी के कारण करीब 1,000 से ज्यादा मौतें दर्ज की गईं। अधिकारियों के मुताबिक इनमें लगभग 85 प्रतिशत मृतक बुजुर्ग थे और अधिकांश मौतें घरों में हुईं।

राजधानी पेरिस और उसके आसपास के इलाकों में सबसे अधिक मामले सामने आए हैं। देश के कई हिस्सों में तापमान 44.3 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि राष्ट्रीय औसत तापमान भी रिकॉर्ड स्तर पर रहा।

गर्मी के कारण रेल पटरियों के फैलने से ट्रेनों का संचालन प्रभावित हुआ और हजारों घरों की बिजली आपूर्ति भी बाधित रही। सरकार ने 1,350 से अधिक स्कूल बंद कर दिए हैं और लोगों को दोपहर के समय घरों से बाहर न निकलने की सलाह दी है।

जर्मनी, स्पेन और ब्रिटेन में रिकॉर्ड गर्मी

जर्मनी में भी गर्मी ने नया इतिहास रच दिया। ड्रैविट्ज शहर में तापमान 41.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि कई इलाकों में रात का तापमान भी 29 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं गया। अत्यधिक गर्मी के कारण कई हाईवे की सड़कें पिघलने लगीं और यातायात प्रभावित हुआ। सुरक्षा कारणों से कई खेल प्रतियोगिताएं और सार्वजनिक कार्यक्रम भी स्थगित कर दिए गए।

स्पेन इस समय यूरोप के सबसे गर्म देशों में शामिल है। एंडुजार शहर में तापमान 45.1 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। उत्तरी शहर बिलबाओ में भी जून का सर्वकालिक तापमान रिकॉर्ड टूट गया। भीषण गर्मी और सूखे के कारण जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ गई हैं और कई कस्बों को खाली कराना पड़ा है।

ब्रिटेन में भी जून महीने की गर्मी ने पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। दक्षिणी इंग्लैंड में तापमान 36.4 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। गर्मी के चलते 1,000 से अधिक स्कूल बंद कर दिए गए हैं। रेलवे पटरियों के फैलने के खतरे को देखते हुए ट्रेनों की गति सीमित कर दी गई है, जबकि कई क्षेत्रों में पानी की बचत के लिए होजपाइप के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी गई है।

अन्य यूरोपीय देशों में भी गंभीर स्थिति

डेनमार्क जैसे ठंडे देश में तापमान 37 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो वहां के इतिहास का सबसे अधिक तापमान बताया जा रहा है। सड़कें पिघलने की घटनाओं के बाद भारी वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाया गया है।

इटली में रोम, मिलान, फ्लोरेंस, वेनिस और ट्यूरिन सहित 18 शहरों में रेड हीट अलर्ट जारी किया गया है। देश की सबसे लंबी पो नदी का जलस्तर लगातार घट रहा है, जिससे खेती और पेयजल आपूर्ति पर खतरा बढ़ गया है।

स्विट्जरलैंड में जून महीने का सबसे अधिक तापमान दर्ज किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक गर्मी के कारण ग्लेशियर सामान्य से कहीं अधिक तेजी से पिघल रहे हैं। वहीं चेक रिपब्लिक, पोलैंड और पुर्तगाल में भी रिकॉर्डतोड़ गर्मी और जंगलों में आग का खतरा बढ़ गया है। कई देशों ने नागरिकों के लिए स्वास्थ्य चेतावनी जारी की है।

वैज्ञानिकों ने जताई चिंता, स्वास्थ्य एजेंसियों की सलाह

जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि यूरोप दुनिया के उन क्षेत्रों में शामिल है जहां औसत वैश्विक तापमान की तुलना में अधिक तेजी से गर्मी बढ़ रही है। लगातार बढ़ते तापमान के पीछे जलवायु परिवर्तन को प्रमुख कारण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी नहीं लाई गई तो भविष्य में हीटवेव पहले की तुलना में अधिक बार आएंगी, अधिक तीव्र होंगी और लंबे समय तक बनी रहेंगी।

स्वास्थ्य एजेंसियों ने लोगों को पर्याप्त मात्रा में पानी पीने, धूप में लंबे समय तक रहने से बचने, दोपहर के समय घर के अंदर रहने और बुजुर्गों, बच्चों तथा बीमार लोगों का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी है। प्रशासन ने कई शहरों में कूलिंग सेंटर भी शुरू किए हैं ताकि लोगों को अत्यधिक गर्मी से राहत मिल सके। यूरोप की मौजूदा हीटवेव ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि बदलती जलवायु अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के लिए भी गंभीर चुनौती बनती जा रही है।