MP के सरकारी स्कूलों से एक साल में 7.44 लाख बच्चे कम, आदिवासी जिलों में नामांकन में भारी गिरावट
मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों में एक साल में 7.44 लाख (दो साल में करीब 14 लाख) बच्चों के कम प्रवेश, खासकर आदिवासी जिलों में नामांकन में भारी गिरावट, हजारों स्कूलों में शून्य या बेहद कम दाखिले और विभागों में 35% पद रिक्त होने से मॉनिटरिंग कमजोर होने की गंभीर स्थिति सामने आई है।
भोपाल:मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों से बच्चों का लगातार दूर होना स्कूल शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा दिसंबर तक एकत्र किए गए आंकड़ों में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि प्रदेश में केवल एक वर्ष के भीतर सरकारी स्कूलों में प्रवेश लेने वाले बच्चों की संख्या पिछले साल की तुलना में 7.44 लाख कम हो गई है।
अभियान जारी, लेकिन खाली होते सरकारी स्कूल
यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब यह देखा जाए कि सरकार की ओर से लगातार सरकारी स्कूलों में नामांकन बढ़ाने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं और स्वयं मुख्यमंत्री ने स्कूलों को प्रवेश बढ़ाने का लक्ष्य दिया था। इसके बावजूद बड़ी संख्या में बच्चों का सरकारी स्कूलों से दूरी बनाना न केवल योजनाओं की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत को भी उजागर करता है।
स्कूलों में कम प्रवेश लेने के मामले में आदिवासी जिले सबसे आगे
यदि बीते साल का आंकड़ा भी इसमें जोड़ लें तो यह संख्या करीब 14 लाख पार कर जाएगी। सरकारी स्कूलों में कम प्रवेश लेने के मामले में आदिवासी जिले सबसे आगे हैं। इनमें बड़वानी में करीब 21 हजार, बैतूल में करीब 14 हजार, सिंगरौली में करीब 17 हजार 500, खंडवा में 14740, अलीराजपुर में लगभग 16 हजार, झाबुआ में 24992 और धार में 32348 बच्चों ने स्कूल से दूरी बनाई। यह स्थिति तब है, जबकि सीएम ने प्रवेश बढ़ाने का टारगेट स्कूलों को दिया था।
55 जिले, 3500 स्कूल, एक भी बच्चे का प्रवेश नहीं
हाल यह है कि मप्र के 55 जिलों में इस साल साढ़े तीन हजार सरकारी स्कूलों से अधिक में एक भी बच्चे ने प्रवेश नहीं लिया है। वहीं 6500 से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं, जिनमें बच्चों का एडमिशन दहाई का अंक भी नहीं छू सका है। जब अधिकारी निरीक्षण करने जाते हैं तो उन्हें ही बताया जाता है कि इतने ही बच्चे हैं।अब इसको रोकने के लिए विभाग के अधिकारियों ने हेडमास्टर और शिक्षकों को कहा है कि वे स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के नाम की लिस्ट नोटिस बोर्ड पर चस्पा करें। इस मामले में विभागीय मंत्री उदय प्रताप सिंह का कहना है कि ड्रापआउट के कारण जानने के लिए लगातार हम प्रयास कर रहे हैं और सुधार भी हो रहा है।
मॉनीटरिंग करने वाले अफसर के पद खाली
विभाग ने बच्चों के स्कूल छोड़ने के कारणों की जानकारी जुटाई तो उसमें मॉनीटरिंग करने वाले अफसरों की कमी भी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार स्कूल शिक्षा विभाग में जिला स्तर पर जिला परियोजना समन्वयक व जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में करीब 35% पद रिक्त हैं।इसकी वजह से निरीक्षण, मॉनिटरिंग व स्कूलों की वास्तविक रिपोर्ट समय पर नहीं आ पा रही है। भोपाल में भी डीपीसी की जिम्मेदारी राजस्व सेवा के अफसर के पास है और यहां इस साल करीब 51 हजार बच्चों ने सरकारी स्कूलों में कम प्रवेश लिया है।
sanjay patidar 
