डभौरा नगर परिषद के बदहाली की तस्वीरः चल रहे सिस्टम से स्वच्छता के खिताब पर उठे सवाल

रीवा जिले की नई बनी डभौरा नगर परिषद का स्वच्छता मॉडल आपको हैरान कर देगी. स्वच्छता का ये मॉडल फाइलों में तो चमक रहा है, लेकिन जमीन पर उतरते ही बदबू मारने लगता है

डभौरा नगर परिषद के बदहाली की तस्वीरः चल रहे सिस्टम से स्वच्छता के खिताब पर उठे सवाल

रीवा जिले की नवसृजित डभौरा नगर परिषद इन दिनों अपने अनोखे “स्वच्छता मॉडल” को लेकर चर्चा में है। ऐसा मॉडल, जो फाइलों में तो चमकता है, लेकिन जमीन पर उतरते ही बदबू मारने लगता है। स्वच्छता के खिताबों से अपनी पीठ थपथपाने वाला नगर प्रशासन अगर वार्ड क्रमांक 6 अंबेडकर नगर में झांक ले, तो शायद आईना देखने की जरूरत ही न पड़े।

नालियां नहीं, तालाब बना वार्ड

अंबेडकर वार्ड में हालात ऐसे हैं मानो नालियों की जगह छोटे-छोटे तालाब बना दिए गए हों। बस्ती के बीच घुटनों तक भरा दूषित, सड़ांध मारता पानी लोगों के धैर्य की असली परीक्षा ले रहा है। कचरे का अंबार, कीचड़ और बदबू ने मिलकर ऐसा माहौल बना दिया है कि घर से निकलना किसी एडवेंचर से कम नहीं।

मच्छर मुफ्त में, बीमारियां बोनस में

नगर परिषद की “मेहरबानी” से मच्छर यहां मुफ्त में मिल रहे हैं और उनके साथ बीमारियों का बोनस पैक भी। स्थानीय लोगों का कहना है कि डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियां अब यहां मेहमान नहीं, बल्कि स्थायी निवासी बन चुकी हैं। हालत यह है कि वही दूषित पानी रिसकर हैंडपंपों और कुओं तक पहुंच रहा है और लोगों को मजबूरी में वही पानी पीना पड़ रहा है।

शिकायतें कई, नतीजा शून्य

स्थानीय निवासी विवेक मिश्रा बताते हैं कि वार्ड पार्षद से लेकर नगर परिषद तक सैकड़ों बार गुहार लगाई गई, लेकिन हर बार जवाब एक ही—“देखते हैं, करा देंगे।” करीब 200 मीटर का रास्ता आज तक फाइलों से बाहर नहीं निकल पाया, नालियों की सफाई महीनों से भगवान भरोसे है और पानी निकासी की व्यवस्था सिर्फ कागजों में मौजूद है।

जिम्मेदारी किसकी? जवाब कोई नहीं

लोगों का सवाल सीधा है—अगर शुद्ध पेयजल, साफ-सफाई और जल निकासी नगर परिषद की जिम्मेदारी नहीं है, तो फिर किसकी है? खाली पड़े प्लॉटों में सालभर भरा रहने वाला गंदा पानी अब जलस्रोतों को भी दूषित कर रहा है और लोग बीमार पड़ रहे हैं।

नगर परिषद का तर्क

इस पूरे मामले पर ज्ञानेंद्र प्रसाद मिश्रा, सीएमओ, नगर परिषद डभौरा का कहना है कि कर्मचारियों की भर्ती का मामला न्यायालय में होने और अन्य व्यस्तताओं के कारण काम प्रभावित हुआ है। साथ ही जल्द ही सड़क और पानी निकासी के लिए एस्टीमेट तैयार कर हालात सुधारने की बात कही गई है।

सवाल जस का तस

फिलहाल अंबेडकर वार्ड के हालात यही सवाल पूछ रहे हैं कि क्या स्वच्छता सिर्फ फाइलों और पुरस्कारों तक ही सीमित है? या फिर कभी जमीन पर भी उतरेगी। जवाब का इंतजार अब भी घुटनों तक भरे उसी गंदे पानी में खड़ा है।