पेट्रोल ₹18 और डीजल ₹35 महंगा हो सकता है: चुनाव के बाद दाम बढ़ने की आशंका, तेल कंपनियां भारी नुकसान में

चुनाव के बाद पेट्रोल ₹18 और डीजल ₹35 तक महंगे हो सकते हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से ऑयल कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है।

पेट्रोल ₹18 और डीजल ₹35 महंगा हो सकता है: चुनाव के बाद दाम बढ़ने की आशंका, तेल कंपनियां भारी नुकसान में

कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें पिछले कई महीनों से स्थिर हैं। लेकिन विदेशी ब्रोकरेज फर्म मैक्वायरी की हालिया रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इससे तेल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs) भारी घाटे में हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा स्थिति में कंपनियों को पेट्रोल पर प्रति लीटर ₹18 और डीजल पर ₹35 का नुकसान हो रहा है।

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु समेत पांच राज्यों में अप्रैल 2026 के अंत में विधानसभा चुनाव पूरा होने के बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इजाफा होने की संभावना जताई जा रही है। चुनावी मौसम में कीमतें बढ़ाने से आम जनता पर बोझ पड़ सकता है, इसलिए सरकार और कंपनियां फिलहाल दाम स्थिर रखे हुए हैं।

कंपनियां हर दिन ₹1,600 करोड़ का घाटा झेल रही हैं..
मैक्वायरी रिपोर्ट में कहा गया है कि स्पॉट पेट्रोल-डीजल प्राइसिंग ($135-165 प्रति बैरल) पर तेल कंपनियां पेट्रोल बेचने पर ₹18 प्रति लीटर और डीजल पर ₹35 प्रति लीटर घाटा उठा रही हैं। कुछ समय पहले यह नुकसान और भी ज्यादा था, हर दिन लगभग ₹2,400 करोड़ तक पहुंच गया था। सरकार ने मार्च 2026 में एक्साइज ड्यूटी में ₹10 प्रति लीटर की कटौती की, जिससे कंपनियों का दैनिक घाटा घटकर ₹1,600 करोड़ रह गया है। हर $10 प्रति बैरल की बढ़ोतरी से प्रति लीटर नुकसान में करीब ₹6 का इजाफा होता है।

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88% आयात करता है। इसमें 45% मिडिल ईस्ट और 35% रूस से आता है। पश्चिम एशिया में तनाव और हॉर्मुज स्ट्रेट की अशांति ने कच्चे तेल की कीमतों को $100 प्रति बैरल के ऊपर पहुंचा दिया है, जिससे कंपनियों पर दबाव बढ़ गया है।

एक्साइज ड्यूटी का योगदान 9 साल में घटकर आधा से भी कम..
वित्त वर्ष 2017 में पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी सरकारी राजस्व का 22% हिस्सा थी, जो अब घटकर सिर्फ 8% रह गई है। सरकार ने हाल ही में ड्यूटी काटकर कंपनियों को कुछ राहत दी है, लेकिन अगर पूरी एक्साइज ड्यूटी हटा भी दी जाए तो भी मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर कंपनियों का घाटा पूरी तरह खत्म नहीं होगा।
पड़ोसी और विकसित देशों में दाम बढ़ चुके हैं अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत अगस्त 2022 के बाद पहली बार $4 प्रति गैलन से ऊपर पहुंच गई है। पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों ने भी पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाए हैं। भारत में कीमतें स्थिर रखने के लिए सरकार और कंपनियां सब्सिडी जैसा बोझ उठा रही हैं, लेकिन यह लंबे समय तक नहीं चल सकता।

भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें कैसे तय होती हैं..
जून 2010 तक पेट्रोल की कीमत सरकार तय करती थी और हर 15 दिन में बदलाव होता था। 26 जून 2010 के बाद यह जिम्मेदारी ऑयल कंपनियों को सौंप दी गई। डीजल के मामले में अक्टूबर 2014 तक सरकार नियंत्रण में रखती थी, उसके बाद कंपनियों को छोड़ दिया गया। अब ऑयल कंपनियां (IOC, BPCL, HPCL) रोजाना अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, डॉलर-रुपया एक्सचेंज रेट, ट्रांसपोर्टेशन खर्च, टैक्स और अन्य फैक्टर्स को ध्यान में रखकर पेट्रोल-डीजल की कीमत तय करती हैं। हालांकि, चुनाव या महंगाई के संवेदनशील समय में सरकार कंपनियों को दाम न बढ़ाने की सलाह देती है।

क्या होगा आगे..
मैक्वायरी ने साफ कहा है कि अप्रैल 2026 के अंत में राज्य चुनाव (खासकर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु) खत्म होने के बाद पंप पर कीमतें बढ़ने का जोखिम है। अगर कच्चा तेल महंगा रहता रहा तो चालू खाता घाटा (CAD) भी बढ़ सकता है। अनुमान है कि 2026 की पहली तिमाही में CAD $20 बिलियन तक पहुंच सकता है।

उपभोक्ताओं के लिए सलाह..

अभी कीमतें स्थिर हैं, लेकिन चुनाव बाद बदलाव संभव है। वाहन मालिक ईंधन की बचत के उपाय अपनाएं- पब्लिक ट्रांसपोर्ट या ईंधन कुशल वाहनों का इस्तेमाल। सरकार भी वैकल्पिक ऊर्जा और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दे रही है, जो लंबे समय में राहत दे सकता है।