महिला की छाती दबाना, सलवार उतारना रेप की कोशिश नहीं? Patna HC के फैसले पर CJI नाराज

महिला की छाती दबाने और सलवार उतारने की कोशिश से जुडे मामले में पटना हाईकोर्ट के फैसले पर चर्चा तेज है. जानिए पूरा मामला, कोर्ट का फैसला और CJI की नाराजगी की वजह.

Patna, Bihar. महिला के साथ जबरन अश्लील हरकत करने से जुडे एक पुराने मामले में पटना हाईकोर्ट का फैसला चर्चा में आ गया है. आरोपी पर महिला की छाती दबाने और उसकी सलवार उतारने की कोशिश करने का आरोप था. निचली अदालत ने इसे रेप की कोशिश मानते हुए आरोपी को दोषी ठहराया था, लेकिन पटना हाईकोर्ट ने इस निष्कर्ष से असहमति जताई. अब इस तरह के फैसलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक संवेदनशीलता और तय दिशा निर्देशों के पालन पर जोर दिया है.

क्या है पूरा मामला?

यह मामला Bihar के Banka जिले के Amarpur क्षेत्र का बताया जा रहा है. घटना जनवरी 2008 की है. शिकायत के अनुसार एक युवती अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने के लिए एक फोटो स्टूडियो गई थी.

आरोप था कि स्टूडियो संचालक ने युवती को अंदर बुलाया, जबकि उसके पिता को बाहर कंप्यूटर स्क्रीन पर फोटो देखने के लिए कहा. इसके बाद आरोपी ने कथित तौर पर कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

पीडिता के आरोप के अनुसार आरोपी ने उसके साथ जबरदस्ती की, उसकी छाती दबाई और सलवार उतारने की कोशिश की. युवती ने शोर मचाया तो उसके पिता ने दरवाजा खोलने की कोशिश की. शोर सुनकर आसपास के लोग भी जमा हो गए. इसके बाद आरोपी मौके से भाग गया.

निचली अदालत ने माना था रेप की कोशिश

मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने आरोपी को रेप की कोशिश के अपराध में दोषी ठहराया था. इसके बाद आरोपी ने अपनी दोषसिद्धि को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी.

हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि आरोपी की कथित हरकतें क्या कानूनी तौर पर रेप की कोशिश की श्रेणी में आती हैं या नहीं.

पटना हाईकोर्ट ने पलटा फैसला

पटना हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और उपलब्ध सबूतों का परीक्षण करने के बाद रेप की कोशिश के आरोप में हुई दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा. कोर्ट का मानना था कि अभियोजन पक्ष रेप की कोशिश के अपराध को आवश्यक कानूनी मानकों के अनुसार साबित नहीं कर सका.

हाईकोर्ट ने आरोपी की कथित हरकतों को महिला की गरिमा और शील भंग करने वाला कृत्य माना, लेकिन इसे रेप की कोशिश के अपराध के लिए पर्याप्त नहीं माना.

इस फैसले के बाद सवाल उठने लगे कि किसी महिला की छाती दबाना और उसके कपडे उतारने की कोशिश जैसी कथित हरकतों को रेप की कोशिश मानने के लिए कानून में किस स्तर के सबूत और इरादे को साबित करना आवश्यक है.

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा न्यायिक संवेदनशीलता का मुद्दा

महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों से जुडे मामलों में अदालतों की भाषा और न्यायिक दृष्टिकोण को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी दिशा निर्देश जारी कर चुका है. इसी संदर्भ में CJI सूर्यकांत ने न्यायिक अधिकारियों द्वारा संवेदनशील मामलों में पर्याप्त रिसर्च और तय दिशा निर्देशों के अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया.

CJI ने इस बात पर नाराजगी जताई कि संवेदनशील मामलों में फैसला देते समय न्यायाधीशों को सुप्रीम कोर्ट की ओर से पहले तय किए गए सिद्धांतों और दिशा निर्देशों का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट का जोर इस बात पर रहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुडे मामलों में फैसले केवल कानूनी प्रावधानों तक सीमित न रहें, बल्कि उनमें न्यायिक संवेदनशीलता भी दिखाई दे.

क्या आरोपी पूरी तरह बरी हुआ?

इस मामले में "आरोपी को बरी कर दिया गया" कहना पूरी तस्वीर नहीं बताता. मुख्य कानूनी विवाद रेप की कोशिश के आरोप को लेकर था. पटना हाईकोर्ट ने रेप की कोशिश वाली दोषसिद्धि को स्वीकार नहीं किया और कथित कृत्य को महिला की गरिमा भंग करने वाले अपराध के दायरे में देखा.

मामले ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि यौन अपराधों में आरोपी की हरकत, उसके इरादे और अपराध की तैयारी तथा वास्तविक कोशिश के बीच कानूनी सीमा कैसे तय की जानी चाहिए.

साथ ही यह मामला अदालतों के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल भी खडा करता है कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों की सुनवाई करते समय कानून की तकनीकी व्याख्या और पीडिता के प्रति न्यायिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए.