नीति आयोग रिपोर्ट 2026: MP के 67 हजार स्कूलों में इंटरनेट नहीं, 52 हजार शिक्षक पद खाली 

MP शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा खुलासा: 14 हजार स्कूलों में बिजली नहीं, 10वीं के बाद बढ़ रहा ड्रॉपआउट

नीति आयोग रिपोर्ट 2026: MP के 67 हजार स्कूलों में इंटरनेट नहीं, 52 हजार शिक्षक पद खाली 

मध्य प्रदेश के स्कूलों की स्थिति पर आई NITI Aayog की ताज़ा रिपोर्ट ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था की गंभीर तस्वीर सामने रखी है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं से लेकर डिजिटल शिक्षा तक कई बड़े गैप अभी भी बने हुए हैं। इंटरनेट, बिजली, स्मार्ट क्लास, कंप्यूटर और शिक्षकों की कमी का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और उनके स्कूल में टिके रहने पर पड़ रहा है। यह रिपोर्ट मई 2026 में जारी की गई है और इसमें यूडाइस प्लस 2024-25 और परख 2024 के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है।

देश में मध्य प्रदेश की स्थिति

रिपोर्ट के मुताबिक विभिन्न मानकों पर मध्य प्रदेश की रैंकिंग निम्न रही:

  • इंटरनेट सुविधा: लगभग 25वां स्थान
  • स्मार्ट क्लास: 28वां स्थान
  • बिजली सुविधा: 18वां स्थान
  • कंप्यूटर सुविधा: 18वां स्थान
  • टॉयलेट सुविधा: 17वां स्थान

इंटरनेट सुविधा में कई राज्यों से पीछे मध्य प्रदेश

रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में कुल 1 लाख 22 हजार 120 स्कूल हैं, लेकिन इनमें से केवल 45.7% स्कूलों में ही इंटरनेट की सुविधा है। इसका मतलब है कि आधे से ज्यादा स्कूल अभी भी डिजिटल दुनिया से नहीं जुड़े हैं। लगभग 54.3 % यानी 67 हजार 532 स्कूलों में इंटरनेट नहीं है। राष्ट्रीय औसत 63.5% से भी राज्य करीब 18 प्रतिशत अंक पीछे है।

इंटरनेट सुविधा के मामले में मध्य प्रदेश देश के 24 राज्यों से पीछे है यानी 25 वें स्थान पर है। स्कूलों में इंटरनेट सुविधा के मामले में मध्यप्रदेश ने 10 साल में 3.8% से बढ़कर 45.7% तक का सफर तय किया है, लेकिन बिहार असम और ओडिशा तीन ऐसे राज्य हैं जो 2014-15 में एमपी से पीछे थे और आज काफी आगे निकल चुके हैं। 

स्मार्ट क्लास और डिजिटल पढ़ाई की कमजोर स्थिति

डिजिटल शिक्षा के दूसरे महत्वपूर्ण हिस्से स्मार्ट क्लास की स्थिति भी एमपी में कमजोर है। रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश के सरकारी और निजी स्कूलों में 2024-25 में केवल 19.6% स्कूलों में ही स्मार्ट क्लासरूम ठीक से काम कर रहे हैं, जबकि देश का औसत 30.6% है। आकंड़ों की बात करे तो प्रदेश के 98 हजार 184 स्कूलों में स्मार्ट क्लास रूम नहीं है। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में बच्चे अभी भी पुराने तरीके से पढ़ाई कर रहे हैं, जबकि डिजिटल शिक्षा अब देशभर में तेजी से बढ़ रही है।

इस मामले में एमपी 28 वें स्थान पर है यानी देश के 20 राज्यों और 8 केंद्रशासित प्रदेशों से पीछे है। 2021-22 में एमपी में 5.2% स्कूलों में स्मार्ट क्लासरूम थे जो 2024-25 में बढ़कर 19.6% हो गए है, लेकिन कई ऐसे राज्य हैं जो 2021-22 में एमपी से पीछे थे और आज काफी आगे निकल चुके हैं।

बिजली और कंप्यूटर की कमी भी बड़ी समस्या

स्कूलों में बिजली की उपलब्धता के मामले में भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। देश के 17 राज्यों से पीछे एमपी 18 वें स्थान पर है। प्रदेश के सरकारी और निजी स्कूलों में 2024-25 में 87.8% स्कूलों में फंक्शनल बिजली है, जबकि राष्ट्रीय औसत 91.9% है। यानी एमपी अब भी देश के औसत से 4.1 प्रतिशत अंक पीछे है। 

आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश के करीब 1.22 लाख स्कूलों में से लगभग 14,900 स्कूलों में अब भी काम करने वाली बिजली नहीं है। इससे न केवल पढ़ाई प्रभावित होती है, बल्कि कंप्यूटर और स्मार्ट क्लास जैसे डिजिटल साधन भी बेकार हो जाते हैं। 

2014-15 में मध्यप्रदेश में सिर्फ 26.3% स्कूलों में बिजली थी, जो 2024-25 में बढ़कर 87.8% हो गई है। यानी 10 साल में प्रदेश ने लंबी छलांग लगाई, लेकिन कई ऐसे राज्य हैं जो 2014-15 में एमपी से पीछे थे और आज आगे निकल चुके हैं।

वहीं, कंप्यूटर की बात करें तो मध्यप्रदेश देश के 17 राज्यों से पीछे है और बड़े राज्यों में उसका 18वां स्थान है। 2024-25 में सिर्फ 59.2% स्कूलों में ही कंप्यूटर उपलब्ध हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 64.7% है। लगभग 49,800 स्कूलों में कंप्यूटर नहीं हैं, यानी एमपी देश के औसत से 5.5 प्रतिशत अंक पीछे है। यह स्थिति डिजिटल शिक्षा के लक्ष्य को और मुश्किल बनाती है। 

आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश के करीब 1.22 लाख स्कूलों में से लगभग 72,300 स्कूलों में कंप्यूटर हैं। 2014-15 में मध्यप्रदेश के सिर्फ 14.6% स्कूलों में कंप्यूटर थे, जो 2024-25 में बढ़कर 59.2% हो गए हैं। यानी 10 साल में प्रदेश ने 44.6 प्रतिशत अंक की बढ़त दर्ज की, लेकिन ऐसे राज्य हैं जो उस समय एमपी से पीछे थे और आज काफी आगे निकल चुके हैं।

टॉयलेट और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति

स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की बात करें तो टॉयलेट की स्थिति भी पूरी तरह मजबूत नहीं है। इस मामले में मध्यप्रदेश देश के 16 राज्यों से पीछे है और बड़े राज्यों में उसका 17वां स्थान है। नीति आयोग 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के स्कूलों में लड़कों के लिए 87.2% और लड़कियों के लिए 88.6% स्कूलों में ही फंक्शनल टॉयलेट हैं। जबकि राष्ट्रीय औसत क्रमशः 92.4% और 94% है। यानी एमपी दोनों मामलों में देश के औसत से करीब 5 प्रतिशत अंक पीछे है।

हजारों स्कूल ऐसे हैं जहां या तो टॉयलेट नहीं हैं या वे ठीक से काम नहीं करते। यह स्थिति खासकर लड़कियों की शिक्षा पर असर डालती है। आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश के करीब 1.22 लाख स्कूलों में से लगभग 15,600 स्कूलों में लड़कों के टॉयलेट नहीं हैं, जबकि करीब 13,900 स्कूलों में लड़कियों के टॉयलेट की सुविधा नहीं है।

10 साल पहले 2014-15 में मध्यप्रदेश के 78% स्कूलों में लड़कों के और 78.7% स्कूलों में लड़कियों के टॉयलेट थे, जो 2024-25 में बढ़कर 87.2% और 88.6% हो गए हैं। सुधार जरूर हुआ, लेकिन कई ऐसे राज्य हैं जो 2014-15 एमपी से पीछे थे और आज काफी आगे निकल चुके हैं।

बच्चों का स्कूल छोड़ना (ड्रॉपआउट) अब भी चुनौती

रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिक कक्षाओं (1 से 5) में स्थिति बेहतर हुई है और यहां ड्रॉपआउट लगभग शून्य हो गया है। अब पहली कक्षा से पाचंवी कक्षा तक कोई भी बच्चा पढ़ाई नहीं छोडता है। 10 साल पहले ये आंकड़ा 10.14% था। लेकिन जैसे-जैसे बच्चे आगे बढ़ते हैं, स्थिति बदल जाती है। 

  • कक्षा 6 से 8: 6.3% ड्रॉपआउट
  • कक्षा 9 से 10: 16.8% ड्रॉपआउट

कक्षा 6 से 8 आते-आते हर 100 में करीब 6 बच्चे पढ़ाई बीच में छोड़ रहे हैं। इस मामले में एमपी देश में चौथे नंबर पर है, यानी सिर्फ 3 राज्यों में एमपी से ज्यादा ड्रॉपआउट है। वहीं कक्षा 9-10 में स्थिति और चिंताजनक है। यहां  हर 100 में करीब 17 बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं। इस मामले में एमपी देश में आठवें नंबर पर है, यानी सिर्फ 7 राज्यों में हालत एमपी से खराब है।

शिक्षक की भारी कमी और एक-शिक्षक स्कूल

मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक शिक्षक की कमी है। राज्य में कुल 52,019 शिक्षक पद खाली हैं। इनमें 47 हजार 122 पद प्राथमिक स्कूलों में, 2 हजार 877 पद माध्यमिक में, 2 हजार 20 पद उच्च माध्यमिक में खाली हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि 7,217 स्कूल ऐसे हैं जहां पूरी पढ़ाई सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रही है। एक ही शिक्षक को कई कक्षाएं और विषय पढ़ाने पड़ते हैं, जिससे पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित होती है। प्राथमिक स्तर पर एक शिक्षक पर औसतन 16 बच्चे, उच्च प्राथमिक और माध्यमिक में 14 बच्चे, जबकि उच्च माध्यमिक में 15 बच्चे हैं।

पिछले 10 साल में सुधार, लेकिन रफ्तार कम

रिपोर्ट यह भी बताती है कि पिछले 10 सालों में मध्य प्रदेश ने कई क्षेत्रों में सुधार किया है।

  • बिजली वाले स्कूल 26.3% से बढ़कर 87.8% हो गए
  • कंप्यूटर वाले स्कूल 14.6% से बढ़कर 59.2% हो गए
  • इंटरनेट और स्मार्ट क्लास में भी बढ़ोतरी हुई

लेकिन कई राज्य, जो पहले मध्य प्रदेश से पीछे थे, अब उससे आगे निकल चुके हैं। खासकर बिहार, असम, ओडिशा और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने तेज सुधार किया है। यह दिखाता है कि राज्य कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में अभी भी राष्ट्रीय औसत से पीछे है।

कुल तस्वीर: सुधार भी, लेकिन चुनौतियां भी बड़ी

रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि मध्य प्रदेश ने पिछले वर्षों में शिक्षा व्यवस्था में सुधार जरूर किया है, लेकिन यह सुधार पर्याप्त नहीं है। डिजिटल शिक्षा, बुनियादी ढांचा और शिक्षक उपलब्धता अभी भी बड़े सवाल बने हुए हैं। अगर इंटरनेट, बिजली और कंप्यूटर जैसी सुविधाएं हर स्कूल तक नहीं पहुंचतीं, तो नई शिक्षा नीति और डिजिटल एजुकेशन का लक्ष्य पूरा करना मुश्किल होगा।

विशेषज्ञों के अनुसार राज्य को तीन बड़े क्षेत्रों पर ध्यान देना होगा:

  1. हर स्कूल में बिजली और इंटरनेट की गारंटी
  2. खाली पड़े शिक्षक पदों को जल्द भरना
  3. स्मार्ट क्लास और कंप्यूटर को गांव-गांव के स्कूलों तक पहुंचाना

इसके बिना शिक्षा में गुणवत्ता सुधार और ड्रॉपआउट रोकना मुश्किल रहेगा। मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां सुधार की दिशा भी दिख रही है, लेकिन रफ्तार अभी भी धीमी है।