MP Politics: दिल्ली में कृषि मंत्री, फिर भी MP की सियासत में एक्टिव क्यों हैं शिवराज? क्या है ‘मामा’ की रणनीति?
केंद्र में कृषि मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे शिवराज सिंह चौहान की मध्य प्रदेश में सक्रियता चर्चा में है। जानिए MP की सियासत में ‘मामा’ की रणनीति और मोहन यादव से जुड़ी राजनीतिक चर्चाओं का क्या मतलब है।
भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में करीब डेढ़ दशक तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान अब केंद्र में कृषि मंत्री हैं, लेकिन मध्य प्रदेश से उनका राजनीतिक जुड़ाव लगातार बना हुआ है. दिल्ली की जिम्मेदारियों के बीच शिवराज का MP आना-जाना, किसानों से जुड़े मुद्दों पर बयान देना और सोशल मीडिया पर उनकी सक्रिय मौजूदगी कई सियासी सवाल खड़े कर रही है. सवाल यह है कि यह सिर्फ अपने प्रदेश से जुड़ाव है या फिर अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन को मजबूत बनाए रखने की रणनीति?
मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी MP से दूरी नहीं
2023 के विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने मध्य प्रदेश की कमान मोहन यादव को सौंपी और शिवराज सिंह चौहान केंद्र की राजनीति में चले गए. इसके बावजूद प्रदेश की राजनीति में शिवराज की मौजूदगी कम नहीं हुई. उनके भाषणों और दौरों से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर लगातार दिखाई देते हैं.

करीब डेढ़ दशक तक मुख्यमंत्री रहने के दौरान शिवराज ने प्रदेश के गांवों और कस्बों तक मजबूत राजनीतिक नेटवर्क बनाया. किसान, महिलाएं और ग्रामीण मतदाता उनकी राजनीति के प्रमुख आधार रहे हैं. यही वजह है कि दिल्ली में बड़ी जिम्मेदारी संभालने के बावजूद मध्य प्रदेश से उनका जुड़ाव राजनीतिक रूप से अहम माना जाता है.
‘मामा’ ब्रांड अब भी एक्टिव
शिवराज सिंह चौहान की सोशल मीडिया मौजूदगी भी चर्चा का विषय है. उनके आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट्स के अलावा कई अनौपचारिक पेज भी सक्रिय हैं, जहां उनके भाषण और कार्यक्रमों को प्रमोट किया जाता है.
सवाल यही उठ रहा है कि यह समर्थकों की स्वाभाविक सक्रियता है या फिर मध्य प्रदेश में शिवराज की राजनीतिक ब्रांडिंग को बनाए रखने की कोशिश. हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में पेड प्रमोशन की कोई स्वतंत्र पुष्टि नहीं दी गई है, इसलिए इसे फिलहाल सवाल और राजनीतिक चर्चा के तौर पर ही देखा जाना चाहिए.

शिवराज बनाम मोहन यादव की चर्चा क्यों?
मध्य प्रदेश की सत्ता अब मुख्यमंत्री मोहन यादव के हाथ में है. वहीं शिवराज के पास केंद्र में कृषि जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय है. दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति में शिवराज की सक्रियता के चलते पुराने और नए नेतृत्व की तुलना होना स्वाभाविक है.
राजनीतिक विश्लेषण का एक पहलू यह भी है कि मोहन यादव को अपनी अलग राजनीतिक पहचान मजबूत करनी है. अगर बड़े किसान कार्यक्रमों या प्रदेश से जुड़े अहम मुद्दों पर शिवराज की मौजूदगी लगातार बनी रहती है, तो दोनों नेताओं के राजनीतिक स्पेस को लेकर चर्चा होना तय है.

मूंग खरीदी के मुद्दे पर भी बढ़ा सियासी दबाव
हाल में मूंग खरीदी को लेकर किसानों के आंदोलन के बीच शिवराज सिंह चौहान का बयान भी चर्चा में आया. रिपोर्ट के मुताबिक, शिवराज ने कहा था कि केंद्र सरकार सीमित मात्रा में मूंग खरीदेगी और बाकी फसल खरीदने की जिम्मेदारी राज्य सरकार को उठानी होगी.इस बयान ने सीधे तौर पर मध्य प्रदेश सरकार पर दबाव बढ़ाया. किसानों के लिए सबसे अहम सवाल फसल की खरीद और भुगतान का है, ऐसे में केंद्र और राज्य की जिम्मेदारी को लेकर होने वाली बयानबाजी का राजनीतिक असर भी दिखाई देता है.
क्या MP में दो पावर सेंटर बन रहे हैं?
फिलहाल शिवराज सिंह चौहान और मोहन यादव के बीच किसी खुले टकराव की बात सामने नहीं आई है. लेकिन राजनीतिक चर्चा में दोनों को दो अलग-अलग तरह की ताकत के रूप में देखा जा रहा है.
मोहन यादव के पास सत्ता और सरकार की मशीनरी है, जबकि शिवराज के पास लंबे मुख्यमंत्री कार्यकाल से बनी राजनीतिक पहचान और जनता से जुड़ाव है. किसान या लाड़ली बहना जैसे मुद्दों पर आज भी शिवराज का नाम चर्चा में आना इसी राजनीतिक प्रभाव का संकेत माना जाता है.

क्या शिवराज की MP वापसी होगी?
शिवराज सिंह चौहान फिलहाल केंद्र में कृषि मंत्री की बड़ी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. इसलिए उनकी तत्काल मध्य प्रदेश वापसी या मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने का कोई स्पष्ट संकेत सामने नहीं है.
लेकिन राजनीतिक तौर पर यह भी साफ है कि मध्य प्रदेश उनकी सबसे मजबूत राजनीतिक जमीन रही है. करीब 18 साल तक मुख्यमंत्री रहने के कारण प्रदेश से उनका भावनात्मक और राजनीतिक रिश्ता गहरा है.
कांग्रेस को भी मिल रहा मुद्दा
शिवराज की सक्रियता और बीजेपी के भीतर पुराने-नए नेतृत्व की चर्चा का फायदा कांग्रेस उठाने की कोशिश कर रही है. विपक्ष लगातार किसान आंदोलन और सरकार की नीतियों को लेकर सवाल उठा रहा है. ऐसे में बीजेपी के लिए चुनौती सिर्फ सरकार चलाने की नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं की राजनीतिक स्वीकार्यता और प्रभाव के बीच संतुलन बनाए रखने की भी है.

