क्या ईरान भी अमेरिका के लिए बनेगा नया ‘क्वैगमायर’? वियतनाम से अफगानिस्तान तक के इतिहास से समझिए पूरा समीकरण
अमेरिका पहले वियतनाम, अफगानिस्तान और इराक में लंबे युद्धों में फंस चुका है. अब ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष को लेकर सवाल उठ रहा है कि क्या यह अमेरिका के लिए नया क्वैगमायर साबित होगा और इसका भारत पर क्या असर पड़ेगा.
दुनियाभर की सेनाओं में अंग्रेजी का एक शब्द बहुत मशहूर है. क्वैगमायर, जिसका मतलब होता है दलदल. जंग अक्सर ऐसा ही दलदल साबित होती है, जिसमें दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाएं भी फंस जाती हैं. अमेरिका भी इसका अपवाद नहीं है. इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब अमेरिका किसी युद्ध में उतरा, लेकिन सालों तक उसमें फंसकर आखिरकार खाली हाथ लौटना पड़ा. इसकी शुरुआत वियतनाम युद्ध से मानी जाती है...
वियतनाम युद्ध: अमेरिका की पहली बड़ी फंसावट
उत्तरी और दक्षिणी वियतनाम के बीच चल रही जंग में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन बी जॉनसन ने दक्षिणी वियतनाम का समर्थन करते हुए सेना भेज दी. अमेरिका को उम्मीद थी कि उसकी सैन्य ताकत के सामने उत्तरी वियतनाम ज्यादा देर टिक नहीं पाएगा. लेकिन रूस और चीन के समर्थन से उत्तरी वियतनाम ने अमेरिका को कड़ी टक्कर दी. करीब 20 साल चले इस युद्ध में 58 हजार अमेरिकी सैनिक मारे गए और आखिरकार अमेरिका को वियतनाम से पीछे हटना पड़ा. अमेरिका के निकलते ही उत्तरी वियतनाम ने पूरे देश पर कब्जा कर लिया.
अफगानिस्तान में भी दोहराई गई वही कहानी
11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में तालिबान को खत्म करने के लिए सैन्य कार्रवाई शुरू की. 20 साल तक चली इस लड़ाई में अमेरिका ने अरबों डॉलर खर्च किए और हजारों सैनिक गंवाए. लेकिन 2021 में अमेरिकी सेना को अफगानिस्तान से वापस लौटना पड़ा. अमेरिका के निकलते ही तालिबान ने कुछ ही दिनों में पूरे अफगानिस्तान पर फिर से कब्जा कर लिया.
इराक युद्ध भी बना लंबा दलदल
साल 2003 में अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को हटाने के लिए इराक पर हमला किया. शुरुआती लड़ाई में अमेरिका को सफलता मिली और सद्दाम हुसैन को मार दिया गया. लेकिन इसके बाद इराक में गृहयुद्ध शुरू हो गया और अमेरिकी सेना वहीं फंसती चली गई. करीब 8 साल तक चले इस मिशन में चार हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मारे गए और 2011 में अमेरिका को इराक से भी वापस लौटना पड़ा.
क्या ईरान भी अमेरिका के लिए नया क्वैगमायर बन रहा है?
अब सवाल उठ रहा है कि क्या ईरान भी अमेरिका के लिए एक नया क्वैगमायर बन सकता है. 28 फरवरी से शुरू हुए हमलों के बाद अमेरिका ने ईरान के कई सैन्य ठिकानों और परमाणु केंद्रों को निशाना बनाया. इन हमलों में ईरान के शीर्ष नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई. लेकिन इसके बाद ईरान की काउंसिल ने उनके बेटे मुज्तबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर घोषित कर दिया. इसके बाद से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है और पूरा मिडिल ईस्ट अस्थिर होता जा रहा है.
जमीनी युद्ध क्यों होगा अमेरिका के लिए खतरनाक?
अगर अमेरिका को ईरान में निर्णायक जीत हासिल करनी है, तो उसे जमीनी युद्ध लड़ना पड़ सकता है. लेकिन ईरान की भौगोलिक स्थिति अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती है. ईरान के जाग्रोस और अल्बोरज़ पर्वत ऐसे इलाके हैं जहां मिसाइल और सैन्य ठिकाने छिपाए गए हैं. अफगानिस्तान की गुफाओं में छिपे तालिबान को अमेरिका 20 साल में खत्म नहीं कर पाया था. ऐसे में ईरान में जमीनी युद्ध और भी मुश्किल हो सकता है.
अगर युद्ध लंबा चला तो भारत पर क्या असर होगा?
अगर ईरान-अमेरिका संघर्ष लंबा चलता है, तो इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा खासकर भारत पर. ईरान के पास सबसे बड़ा हथियार है समुद्री रास्तों को बंद करना.
1. होर्मुज स्ट्रेट बंद हुआ तो
दुनिया के करीब 20% तेल और 18% गैस की सप्लाई इसी रास्ते से होती है. अगर यह रास्ता बंद होता है तो कच्चे तेल की कीमत 150–200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है. इसका सीधा असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर पड़ेगा.
2. बाब अल-मंदेब स्ट्रेट बंद हुआ तो
यह रास्ता लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है और दुनिया के 12–15% समुद्री व्यापार इसी रास्ते से होता है. अगर यह बंद हुआ तो जहाजों को अफ्रीका के रास्ते घूमकर जाना पड़ेगा, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ जाएंगे. भारत का करीब 240 अरब डॉलर का निर्यात इसी समुद्री रास्ते से यूरोप और अमेरिका तक जाता है.
क्या तीसरे विश्व युद्ध का खतरा?
अगर यह संघर्ष और बढ़ता है तो रूस और चीन भी खुलकर ईरान के समर्थन में आ सकते हैं. ऐसी स्थिति में यह युद्ध सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले सकता है. और तब इतिहास इसे शायद तीसरे विश्व युद्ध की शुरुआत के तौर पर याद कर सकता है.
shivendra 
