शिक्षा और शिक्षक कल्याण के लिए जीवन समर्पित करने वाले सुरेंद्रनाथ दुबे का निधन

वरिष्ठ शिक्षाविद् सुरेंद्रनाथ दुबे का 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे मध्यप्रदेश में शिक्षक शिक्षा, शिक्षक कल्याण और शिक्षा नीति के क्षेत्र में पचास साल से सक्रिय रहे और शिक्षकों के मार्गदर्शक के रूप में सम्मानित थे।

शिक्षा और शिक्षक कल्याण के लिए जीवन समर्पित करने वाले सुरेंद्रनाथ दुबे का निधन
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मध्यप्रदेश की शिक्षा और शिक्षकों के कल्याण के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ शिक्षाविद् (educationist) सुरेंद्रनाथ दुबे का 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। रविवार, 8 मार्च को सुबह 6 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। आज 9 मार्च को भोपाल में उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। बता दें कि सुरेंद्रनाथ दुबे पिछले 3–4 महीनों से बीमार चल रहे थे।

कौन थे सुरेंद्रनाथ दुबे?

सुरेंद्रनाथ दुबे ने अपने जीवन के 50 साल शिक्षा व्यवस्था, शिक्षा नीति और शिक्षकों को समर्पित किए। उन्होंने शिक्षा जगत में कई अहम भूमिकाएं निभाईं। वे मध्यप्रदेश प्रशासनिक सेवा से जुड़े थे और उन्होंने शिक्षा विभाग में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। भोपाल स्थित राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT) में काम करते हुए उन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण और शैक्षिक शोध के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया।

उन्होंने बताया कि शिक्षा व्यवस्था का आधार एक शिक्षक होता है। उन्होंने न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था के क्षेत्र में अहम भूमिका निभाई, बल्कि शिक्षकों के विकास पर भी ध्यान दिया। उनका मानना था कि अगर शिक्षक सक्षम और प्रशिक्षित होंगे तो शिक्षा व्यवस्था अपने आप ही प्रभावशाली हो जाएगी।

सुरेंद्रनाथ दुबे का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

  • SCERT, भोपाल में काम कर शिक्षक शिक्षा से जुड़ी कई महत्वपूर्ण पहलें कीं।

  • SCERT की शैक्षिक पत्रिका ‘पलाश’ के संपादक रहे।

  • केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह के साथ मिलकर मध्यप्रदेश के कई जिलों में ‘शिक्षक सदन’ बनवाने में भूमिका निभाई।

  • 1964 के कोठारी आयोग और 1968 की नई शिक्षा नीति से लेकर 2002 तक शिक्षा नीतियों से जुड़े विमर्श और कार्यों में सक्रिय रहे।

  • शिक्षा के अधिकार से जुड़े अनुच्छेद 45 के क्रियान्वयन से संबंधित चर्चाओं और प्रयासों में भी सक्रिय योगदान दिया।

  • स्टेट बोर्ड ऑफ टीचर एजुकेशन में सचिव के रूप में कार्य किया।

  • मध्यप्रदेश के तत्कालीन स्कूल शिक्षा मंत्री महेंद्र सिंह कालुखेड़ा और इंद्रजीत कुमार के सलाहकार रहे।

  • पूर्व मुख्य सचिव शरद चंद्र बेहार के साथ मिलकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के क्रियान्वयन में योगदान दिया।

  • सेवानिवृत्ति के बाद ‘स्कूल शिक्षा’ नामक पत्रिका शुरू की और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर विमर्श जारी रखा।

  • शिक्षाविद् डॉ. गुलाब चौरसिया के साथ कई शैक्षिक कार्यक्रमों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (2003, थाईलैंड) में भाग लिया।

  • गांधीवादी विचारक डॉ. एस. एन. सुब्बराव के साथ जुड़े रहे और सामाजिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया।

  • सुब्बराव जी के लेखों को संकलित कर ‘यायावरी की डायरी’ नाम से पुस्तक प्रकाशित की।

  • 2010 से ‘आत्मनिर्भर शिक्षक सन्दर्भ समूह’ के मार्गदर्शक रहे और शिक्षकों को आत्मनिर्भरता व नवाचार के लिए प्रेरित किया।