जमीनी हकीकत: नगर परिषद नईगढ़ी का हाल बेहाल, जिम्मेदार खामोश

नगर परिषद नईगढ़ी के वार्ड नंबर 3 में नालियों की सफाई नहीं हो रही है, पीने के पानी की भारी कमी है और खुले बिजली ट्रांसफार्मर से हादसे का खतरा बना हुआ है। स्वच्छ भारत मिशन और शौचालय योजना का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पाया है।

जमीनी हकीकत: नगर परिषद नईगढ़ी का हाल बेहाल, जिम्मेदार खामोश

नगर परिषद नईगढ़ी के लगभग सभी वार्डों की हालत ठीक नहीं है, लेकिन वार्ड नंबर 3 की हालत सबसे ज्यादा खराब है। यहां रहने वाले लोग नाम के लिए नगरीय क्षेत्र में रहते हैं, लेकिन उन्हें साफ-सफाई जैसी जरूरी सुविधाएं आज भी नहीं मिल पा रही हैं।

वार्ड में पानी निकालने के लिए नालियां तो बना दी गईं, जिन पर काफी पैसा भी खर्च हुआ, लेकिन उनकी सफाई कई महीनों से नहीं हुई है। लोगों का कहना है कि ठंड के मौसम में भी घरों के सामने गंदा पानी जमा रहता है। इसी गंदगी से मच्छर पैदा हो रहे हैं, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। थोड़ी सी बारिश होते ही नालियों का गंदा पानी घरों में घुस जाता है।

पीने के पानी की समस्या

पीने के पानी की व्यवस्था भी बहुत खराब है। नल जल योजना के नाम पर लोगों से टैक्स तो लिया जाता है, लेकिन पूरे दिन में सिर्फ 10 मिनट ही पानी आता है। मजबूरी में लोग हैंडपंप का सहारा लेते हैं, लेकिन कई हैंडपंप खराब पड़े हैं। कुछ में पाइप न होने की वजह से पानी की जगह हवा निकलती है।

खुला ट्रांसफार्मर बना जान का खतरा

वार्ड के मुख्य रास्ते के पास बिजली का ट्रांसफार्मर लगा है, जिसके तार खुले पड़े हैं। जमीन में करंट फैलने का डर बना रहता है, जिससे कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। इसके बावजूद जिम्मेदार लोग इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं।

सिर्फ कागजों में स्वच्छ भारत मिशन

स्वच्छ भारत मिशन यहां सिर्फ दिखावे तक सीमित है। नालियां कचरे से भरी रहती हैं और नियमित सफाई नहीं होती। सफाई और पानी के नाम पर टैक्स जरूर लिया जाता है, लेकिन योजनाओं का फायदा लोगों को नहीं मिल पा रहा है।

करीब 6 साल पहले स्वच्छ भारत मिशन के तहत हर घर में शौचालय बनाने की योजना आई थी। लेकिन नगर परिषद के कर्मचारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से कागजों में ही शौचालय बना दिए गए। जिन लोगों के घरों में शौचालय हैं, उन्होंने वे अपने पैसों से बनवाए हैं।

शौचालय घोटाला आज भी दबा हुआ

शौचालय बनाने में हुए घोटाले की शिकायत कई बार रीवा और भोपाल तक की गई। जांच के आदेश भी हुए और जांच टीम भी आई, लेकिन जैसे ही घोटाला सामने आया, फाइल को दबा दिया गया। 6 साल बीत जाने के बाद भी न किसी पर कार्रवाई हुई और न ही यह पता चल पाया कि फाइल कहां है।