भारत में चीतों का नया ठिकाना बना कूनो नेशनल पार्क, ढाई साल में समझ लिया चीतों का स्वभाव, दुनिया से बेहतर रहा सर्वाइवल रेट

कूनो नेशनल पार्क अब सिर्फ जंगल नहीं रहा, अब ये चीतों का नया पता बन चुका है. वही चीते, जिन्हें भारत से 70 साल पहले विदा हो जाना पड़ा था, आज पूरे ठाठ से मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में बसे हुए हैं.

भारत में चीतों का नया ठिकाना बना कूनो नेशनल पार्क, ढाई साल में समझ लिया चीतों का स्वभाव, दुनिया से बेहतर रहा सर्वाइवल रेट

कूनो नेशनल पार्क अब सिर्फ जंगल नहीं रहा, अब ये चीतों का नया पता बन चुका है. वही चीते, जिन्हें भारत से 70 साल पहले विदा हो जाना पड़ा था, आज पूरे ठाठ से मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में बसे हुए हैं.  कूनो साल 2018 में नेशनल पार्क बना , लेकिन असली पहचान मिली 17 सितंबर 2022 को, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नामीबिया से आए 8 चीतों को खुले जंगल में छोड़ा. इसके बाद 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीते आए और कूनो की कहानी और दिलचस्प हो गई. नाम के पीछे का राज है कूनो नदी जो चंबल सहायक नदी है. और इसी के नाम पर कूनो का नाम पड़ा. 

क्या है सर्वाइवल रेट की कहानी? 

अब ज़रा आंकड़ों पर आते हैं, क्योंकि कहानी वहीं से बनती है. दुनिया भर में चीता शावकों का सर्वाइवल रेट 50 फीसदी से भी कम है. मतलब आधे बच्चे डेढ़ साल की उम्र से पहले ही दुनिया छोड़ देते हैं. लेकिन कूनो में मामला गजब है, यहां 61 फीसदी से ज़्यादा शावक जिदा हैं, और ये कोई तुक्का नहीं है. नेचुरलिस्ट शुभम पुरोहित बताते हैं... कूनो की टीम ने ढाई साल में चीते का स्वभाव समझ लिया. कब उसे अकेला छोड़ना है, कब निगरानी रखनी है. कूनो की इस कामयाबी का असर ये हुआ कि अब अफ्रीकी देश खुद आगे आ रहे हैं. खबर है कि बोत्सवाना से 8 नए चीते भारत भेजे जाएंगे. उम्मीद है कि ये फरवरी 2026 तक कूनो पहुंच जाएंगे. मतलब साफ है चीतों को कूनो रास आ गया है.

सिर्फ चीते नहीं, यहां तेंदुए भी दिखते हैं?

कूनो में सफारी पर निकले और चीता न दिखे तो मायूस मत होइए. यहां के तेंदुए भी किसी हीरो से कम नहीं. पूरे भारत में करीब 14 हजार तेंदुए हैं, जिनमें से 3400 मध्य प्रदेश में. अकेले कूनो में 300 से ज्यादा तेंदुए मौजूद हैं. खास बात ये कि यहां टाइगर नहीं हैं, इसलिए तेंदुओं को पेड़ों पर चढ़कर छिपने की नौबत नहीं आती.
पर्यटक बताते हैं कि टिकटोली गेट की एक सफारी में 4–5 तेंदुए तक दिख जाते हैं. 

भालू, सियार और पूरा जंगल गैंग

कूनो का जंगल खाली नहीं है. यहां भालू, सियार, लकड़बग्घा, ढोल, और ढेर सारे हिरण. चीतल, सांभर, नीलगाय, काला हिरण यहां है. और मैंने तो देखा भी है..मतलब एक सफारी में पूरा जंगल लाइव. 

ज्वाला, मुखी और पांच शावकों की कहानी

अब जरा उस कहानी पर आते हैं, जिसने चीता प्रोजेक्ट को असली पहचान दी. नामीबिया से आई चीता ज्वाला, और उसकी बेटी मुखी जो भारत में जन्मी पहली चीता बनी. इसके बाद मुखी ने पांच शावकों को जन्म दिया. यहीं से साफ हो गया कि प्रोजेक्ट चीता सिर्फ कोशिश नहीं, कामयाबी की तरफ बढ़ रहा है. 

देव खो – जहां पानी खुद शिव को जल चढ़ाता है

कूनो फॉरेस्ट रिट्रीट के पास एक जगह है. देव खो. जंगल के बीचों-बीच भगवान शिव का पुराना मंदिर, और ऊपर से गिरता प्राकृतिक पानी.  लोग कहते हैं. यहां खुद प्रकृति भोलेनाथ का अभिषेक करती है. सावन में तो यहां पैर रखने की जगह नहीं मिलती. 

ठहरने के लिए टेन्ट सिटी

गुरू ये गजब की चीज है. क्या मस्त रहने की व्यवस्था है मजा आ जाए. चारो तरफ से खेत बीच में टेन्ट मतलब एडवेंचर वाली फील, 25 आरामदायक टेंट. सुबह योग और मेडिटेशन,  साइकिलिंग,  बच्चों के लिए गेम्स. लोकल आर्ट और क्राफ्ट. रात को बोनफायर जलता है, ऊपर सितारे चमकते हैं और नीचे जंगल की आवाजे आरे गुरू मतलब मजा ही मजा. कूनो फॉरेस्ट रिट्रीट का सीजन नवंबर से मार्च तक रहता है.  इसका संचालन मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग के साथ इवोक कैम्पिंग कर रही है.

कूनो अब सिर्फ नेशनल पार्क नहीं है. ये एक कहानी है. चीतों की वापसी की, जंगल की सांसों की और इंसान प्रकृति के तालमेल की. अगर कभी मन करे और जंगल हावी हो जाए. तो कूनो आइए, बाकी कहानी खुद सामने आ जाएगी..