टोल कंपनियां भारी मुनाफे में, फिर भी क्यों जारी है टोल वसूली: अजय सिंह

टोल कंपनियां भारी मुनाफे में, फिर भी क्यों जारी है टोल वसूली अजय सिंह ने सरकार से पूछे कई कानूनी और वित्तीय सवाल

टोल कंपनियां भारी मुनाफे में, फिर भी क्यों जारी है टोल वसूली: अजय सिंह

भोपाल: पूर्व नेता प्रतिपक्ष एवं चुरहट विधायक अजय सिंह 'राहुल भैया' ने लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह को पत्र लिखकर भोपाल–देवास, जावरा–नयागांव तथा लेबड़–जावरा टोल परियोजनाओं को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए हैं। उन्होंने मंत्री द्वारा विधानसभा में दिए गए लिखित उत्तर तथा उपलब्ध ऑडिट रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि तीनों टोल कंपनियां लगातार अत्यधिक लाभ अर्जित कर रही हैं। ऐसे में इन परियोजनाओं को घाटे का बताकर टोल वसूली जारी रखना तथ्य एवं अभिलेखों के विपरीत प्रतीत होता है।

अजय सिंह ने कहा कि ऑडिट रिपोर्टों से स्पष्ट है कि कंपनियां निरंतर ऊंचा ऑपरेटिंग प्रॉफिट अर्जित कर रही हैं। यही कारण है कि इन कंपनियों के शेयर अनुबंध की भावना के विपरीत लगातार ऊंचे मूल्य पर बिके हैं। उन्होंने बताया कि भोपाल–देवास टोल परियोजना की शेयर पूंजी के पुनर्गठन के दौरान नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने फरवरी 2023 में ₹10 अंकित मूल्य वाले प्रत्येक शेयर का बाजार मूल्य ₹1,26,691 निर्धारित किया था। वहीं जावरा–नयागांव परियोजना में अशोका कंस्ट्रक्शन लिमिटेड ने लगभग ₹287 करोड़ के शेयर ₹691 करोड़ में स्थानांतरित किए। इसके अतिरिक्त विदेशी निवेशकों द्वारा भी तीनों टोल कंपनियों में उल्लेखनीय निवेश किया गया।

उन्होंने कहा कि यदि कंपनियां घाटे में होतीं तो न तो उनके शेयर इतने ऊंचे मूल्य पर बिकते, न विदेशी निवेशक निवेश करते और न ही कंपनियां नियमित रूप से आयकर का भुगतान, कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पर व्यय तथा शेयरधारकों को करोड़ों रुपये का लाभांश वितरित कर पातीं। कंपनियों द्वारा अर्जित भारी ऑपरेटिंग प्रॉफिट भी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि परियोजनाएं लाभकारी हैं। अजय सिंह ने अपने पत्र में भोपाल–देवास टोल परियोजना के वित्तीय आंकड़ों का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार वर्ष 2018-19 से 2023-24 तक ₹10 के प्रति इक्विटी शेयर पर आय क्रमशः ₹3,674.71, ₹2,146.74, ₹4,085.12, ₹8,361.14, ₹10,221.35 तथा ₹10,474.79 रही। इसी अवधि में ऑपरेटिंग प्रॉफिट ₹90.87 करोड़ से बढ़कर ₹194.82 करोड़ तक पहुंच गया। वर्ष 2023-24 एवं 2024-25 में कंपनी ने क्रमशः ₹117.84 करोड़ तथा ₹83.25 करोड़ का लाभांश वितरित किया, जबकि सीएसआर गतिविधियों पर क्रमशः ₹1.11 करोड़ एवं ₹1.66 करोड़ खर्च किए।

उन्होंने मंत्री का ध्यान इस तथ्य की ओर भी आकर्षित किया कि शासन के 11 मई 2017 के आदेश के अनुसार प्रमोटरों के पास न्यूनतम 26 प्रतिशत शेयरधारिता बनाए रखना आवश्यक था। इसके बावजूद तीनों परियोजनाओं में प्रमोटर वर्ष 2015-16 में ही अपनी संपूर्ण हिस्सेदारी बेचकर बाहर हो चुके थे। अजय सिंह ने प्रश्न उठाया कि यदि सरकार अनुबंध की 26 प्रतिशत प्रमोटर शेयरधारिता जैसी महत्वपूर्ण शर्त में परिवर्तन कर सकती है, तो लागत से कई गुना अधिक टोल वसूली होने की स्थिति में टोल समाप्त करने का निर्णय क्यों नहीं लिया जा सकता?

अपने पत्र में उन्होंने विभाग द्वारा प्रस्तुत "कुल वास्तविक व्यय" की अवधारणा पर भी गंभीर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि बीओटी अनुबंध में ऐसी किसी अवधारणा या गणना का कोई प्रावधान नहीं है। तीनों कंपनियों की ऑडिटेड बैलेंस शीट में भी "कुल वास्तविक व्यय" नाम से कोई मद उपलब्ध नहीं है। उनके अनुसार यह आंकड़ा निवेशकों द्वारा चार्टर्ड अकाउंटेंट से अनऑडिटेड बुक्स ऑफ अकाउंट के आधार पर तैयार कराया गया प्रमाण-पत्र है, जिसका उद्देश्य केवल जनता को भ्रमित करना प्रतीत होता है। उन्होंने कहा कि अनुबंध संपन्न होने के बाद परियोजना की लागत अथवा व्यय का पुनर्मूल्यांकन करने का कोई प्रावधान नहीं है।

अजय सिंह ने विधानसभा प्रश्न क्रमांक 1270, दिनांक 3 मार्च 2023 के उत्तर का भी उल्लेख किया, जिसमें तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा था कि चार्टर्ड अकाउंटेंट के प्रमाण-पत्र का अनुबंध में कोई उल्लेख नहीं है। उत्तर में यह भी कहा गया था कि अनुबंध की कंडिका-5 के अनुसार समस्त वित्तीय संसाधन जुटाकर परियोजना पूर्ण करना निवेशकर्ता की जिम्मेदारी है तथा बीओटी अनुबंध एक व्यापारिक अनुबंध है, जिसमें लाभ अथवा हानि का जोखिम निवेशकर्ता स्वयं वहन करता है। इसी आधार पर अजय सिंह ने सरकार से कई महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे हैं।

उन्होंने जानना चाहा है कि जब विभाग स्वयं स्वीकार कर चुका है कि चार्टर्ड अकाउंटेंट के प्रमाण-पत्र का अनुबंध में कोई प्रावधान नहीं है, तो वर्तमान में उसी आधार पर कन्सेशनयर के तथाकथित "वास्तविक व्यय" को प्रमाणित कर टोल जारी रखने का निर्णय किस वैधानिक प्रावधान के अंतर्गत लिया गया है? उन्होंने यह भी पूछा कि अनुबंध की किस धारा के तहत कन्सेशनयर के "वास्तविक व्यय" की जानकारी प्राप्त की गई तथा लागत से कई गुना अधिक वसूली और कंपनियों के भारी लाभ में होने के बावजूद टोल समाप्त करने की कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है। अजय सिंह ने कहा कि सरकार को इस पूरे मामले में पारदर्शिता बरतते हुए जनता के समक्ष स्पष्ट करना चाहिए कि जब अनुबंध में लागत के पुनर्मूल्यांकन अथवा चार्टर्ड अकाउंटेंट के प्रमाण-पत्र का कोई प्रावधान नहीं है, तब किस कानूनी आधार पर टोल वसूली को लगातार जारी रखा जा रहा है।