सिंगरौली में सबसे बड़ा विस्थापन: जयंत परियोजना विस्तार के लिए उजड़ेंगे 22 हजार मकान, 50 हजार लोगों को छोड़ना होगा मोरवा
सिंगरौली के मोरवा शहर में एनसीएल की जयंत परियोजना के विस्तार के लिए 22 हजार मकान और 50 हजार से अधिक लोगों का विस्थापन किया जाएगा। फरवरी 2024 से प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। प्रभावित परिवार बेहतर पुनर्वास और सामाजिक पहचान सुरक्षित रखने की मांग कर रहे हैं।
सिंगरौली। देश की ऊर्जा राजधानी कहे जाने वाले सिंगरौली में अब तक का सबसे बड़ा विस्थापन होने जा रहा है। नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (NCL) की जयंत परियोजना के विस्तार के लिए सैकड़ों साल पुराने मोरवा शहर को चरणबद्ध तरीके से खाली कराया जा रहा है। इस प्रक्रिया में करीब 22 हजार मकान, 50 हजार से अधिक लोग, 30 से ज्यादा स्कूल, कई धार्मिक स्थल, अस्पताल और सैकड़ों व्यावसायिक प्रतिष्ठान प्रभावित होंगे।
25 साल तक कोयला उत्पादन बढ़ाने की तैयारी
एनसीएल के मुताबिक, जयंत परियोजना देश की सबसे बड़ी कोयला खदानों में शामिल है। वर्तमान में यहां हर साल करीब 30 मिलियन टन कोयले का उत्पादन होता है। परियोजना के विस्तार के बाद अगले 25 वर्षों तक कोयला उत्पादन जारी रखने की योजना है, जिससे देश के कई ताप विद्युत संयंत्रों को ईंधन की आपूर्ति सुनिश्चित होगी।
फरवरी 2024 से शुरू हुई विस्थापन प्रक्रिया
एनसीएल ने फरवरी 2024 से सर्वेक्षण, नोटिस और मुआवजा वितरण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके बाद मकानों को हटाने की कार्रवाई भी जारी है। अब तक करीब 70 मकान ध्वस्त किए जा चुके हैं, जबकि 475 मकानों पर कार्रवाई अंतिम चरण में है। पूरे विस्थापन का लक्ष्य वर्ष 2029-30 तक पूरा करने का है।
तीन श्रेणियों में बांटे गए प्रभावित परिवार
एनसीएल ने प्रभावितों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। इसमें भूमि स्वामी, अन्य भूमि पर बसे परिवार तथा दुकानदार और व्यवसायी शामिल हैं, जिनकी आजीविका इस क्षेत्र पर निर्भर है। मुआवजा प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए LADM (Land Acquisition and Development Management) डिजिटल पोर्टल का उपयोग किया जा रहा है।
कई वार्ड होंगे प्रभावित
विस्थापन की शुरुआत मोरवा के वार्ड 10 और 9 से हो चुकी है। आगामी चरणों में वार्ड 8, 7, 5, 4 और 3 को भी खाली कराया जाएगा। जैसे-जैसे परियोजना का विस्तार होगा, प्रभावित परिवारों की संख्या बढ़ती जाएगी।
सिर्फ मुआवजा नहीं, बेहतर पुनर्वास की मांग
स्थानीय लोगों का कहना है कि केवल मुआवजा पर्याप्त नहीं है। उनकी मांग है कि सभी विस्थापित परिवारों को एक साथ बसाया जाए, ताकि उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान बनी रहे। लोगों का कहना है कि पुनर्वास की स्पष्ट और व्यापक योजना सामने लाई जाए, जिससे भविष्य को लेकर अनिश्चितता खत्म हो सके।
मोरवा का यह विस्थापन सिर्फ मकानों के हटने की कहानी नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की यादों, रोज़गार और सामाजिक जीवन से जुड़ा बड़ा बदलाव है। ऐसे में विकास और विस्थापन के बीच संतुलन बनाए रखना प्रशासन और एनसीएल के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी।

