भोपाल डिक्लेरेशन-2: दलित-आदिवासी एजेंडे को नई दिशा देने की पहल, 2027 में जारी होगा अंतिम घोषणापत्र

ऐतिहासिक भोपाल डिक्लेरेशन (2002) के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दलित एवं आदिवासी समुदायों के लिए नए साझा एजेंडे के निर्माण की प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू हो गई है। 12–13 जनवरी 2026 को भोपाल में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय विचार-विमर्श कार्यक्रम “भोपाल डिक्लेरेशन-2” के माध्यम से इस पहल का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व मुख्यमंत्री एवं राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने की।

भोपाल डिक्लेरेशन-2: दलित-आदिवासी एजेंडे को नई दिशा देने की पहल, 2027 में जारी होगा अंतिम घोषणापत्र

भोपाल। ऐतिहासिक भोपाल डिक्लेरेशन (2002) के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर दलित और आदिवासी समुदाय के अधिकारों, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों को लेकर एक बार फिर व्यापक राष्ट्रीय मंथन शुरू हो गया है। 12-13 जनवरी 2026 को भोपाल में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय विचार-विमर्श कार्यक्रम के साथ ‘भोपाल डिक्लेरेशन-2’ की औपचारिक प्रक्रिया का शुभारंभ किया जाएगा। इस कार्यक्रम में देशभर से आए सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, प्रशासकों और राजनीतिक प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे।

इसी को लेकर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री एवं राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने भोपाल डिक्लेरेशन-2 की आवश्यकता, पहले डिक्लेरेशन की कमियों और भविष्य की दिशा को लेकर खुलकर अपनी बात रखी।

क्यों जरूरी हुआ भोपाल डिक्लेरेशन-2

पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा ने कहा कि आज हम सभी डिक्लेरेशन-2 पर इसलिए चर्चा कर रहे हैं, क्योंकि पहला डिक्लेरेशन अपने उद्देश्य पूरी तरह हासिल नहीं कर सका। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर दलित एजेंडा-2 की जरूरत क्यों पड़ी। उनका कहना था कि भोपाल डिक्लेरेशन (2002) के तहत जो कानून और नीतियां बनीं, वे जमीनी स्तर पर पूरी तरह लागू नहीं हो सकीं।

सज्जन वर्मा ने आरोप लगाया कि दलित एजेंडे को लागू करने में अधिकारियों और कर्मचारियों ने पलीता लगाया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि अधिकारियों ने इस कानून को फेल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।” उनके अनुसार सरकार की मंशा के बावजूद प्रशासनिक उदासीनता और विरोध के कारण यह एजेंडा सफल नहीं हो पाया।

दिग्विजय सिंह का बयान: नीयत थी, लेकिन समय कम मिला

इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा कि दलित और आदिवासी एजेंडे पर मन से काम किया गया, लेकिन वह अधकचरा रह गया। उन्होंने माना कि अधिकारियों की भूमिका के कारण कई योजनाएं लागू नहीं हो सकीं। दिग्विजय सिंह ने कहा, यह कानून इसलिए लागू नहीं हो पाया क्योंकि अधिकारियों ने नहीं चाहा। हम उसे पूरी तरह लागू नहीं कर पाए, और यही वजह रही कि हमारी सरकार दोबारा नहीं बन सकी।

उन्होंने यह भी कहा कि उस समय जमीनों पर दबंगों का कब्जा था। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय से जमीनें छीनी गई थीं, जिन्हें वापस दिलाकर पट्टे बांटे गए। इसका राजनीतिक और सामाजिक खामियाजा भी कांग्रेस को भुगतना पड़ा। आज भी हजारों एससी-एसटी परिवारों के पास पट्टों के कागजात हैं, लेकिन मौजूदा भाजपा सरकार में उन्हें जमीन का वास्तविक कब्जा नहीं मिल पा रहा है।

ऐतिहासिक संदर्भ और पूर्व प्रयास

भोपाल डिक्लेरेशन बैठक के दौरान दिग्विजय सिंह ने आपातकाल के समय के फैसलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी के दौर में एससी-एसटी वर्ग को पेट्रोल पंप एजेंसियां दी गईं, खेती के पट्टे दिए गए। वहीं, अर्जुन सिंह के कार्यकाल में भी जमीनों के पट्टे दिए गए थे। उनका कहना था कि सामाजिक न्याय के लिए ऐसे ऐतिहासिक कदमों से सीख लेते हुए अब समय की जरूरत के अनुसार नई रणनीति बनानी होगी।

जेन-जी से संवाद की जरूरत

दिग्विजय सिंह ने कहा कि अब समय आ गया है कि जेन-जी यानी नई पीढ़ी के विचारों को समझा जाए। उन्होंने कहा, आज की युवा पीढ़ी क्या सोचती है, क्या चाहती है, इस पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए। इसी सोच के तहत भोपाल डिक्लेरेशन-2 को एक व्यापक, समावेशी और भविष्यपरक दस्तावेज के रूप में तैयार किया जा रहा है।

उन्होंने घोषणा की कि 2002 के डिक्लेरेशन के बाद अब 13 जनवरी 2027 को भोपाल डिक्लेरेशन-2 का अंतिम स्वरूप सामने आएगा। इस दौरान देशभर से सुझाव लिए जाएंगे और चरणबद्ध परामर्श की प्रक्रिया जारी रहेगी।

संविधान और लोकतंत्र पर खतरे की चिंता

इस मंच से नेताओं ने भारतीय संविधान और लोकतंत्र पर मंडरा रहे खतरों को लेकर भी चिंता जताई। दिग्विजय सिंह ने कहा कि समाज में यह भावना बढ़ रही है कि क्या हमारा संविधान सुरक्षित रह पाएगा। उन्होंने दलित-आदिवासी समुदाय से आह्वान किया कि वे संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए संगठित और जागरूक रहें।

भोपाल डिक्लेरेशन-2 की प्रक्रिया और आयोजन

भोपाल डिक्लेरेशन-2 की प्रक्रिया का शुभारंभ बहुजन इंटेलेक्ट, आदिवासी सेवा मंडल और डोमा परिषद के संयुक्त संयोजन में किया गया। इसके साथ ही अनुसूचित जाति-जनजाति से जुड़े अनेक सामाजिक संगठन इस पहल में शामिल हैं।

ड्राफ्टिंग प्रक्रिया के तहत देशभर के एससी-एसटी समुदाय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं, प्रशासकों, नीति-निर्माताओं, बुद्धिजीवियों और राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ चरणबद्ध परामर्श किया जा रहा है। इस सामूहिक मंथन का उद्देश्य सामाजिक न्याय, भूमि अधिकार, शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी और आर्थिक सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर एक साझा भविष्यपरक एजेंडा तैयार करना है।

व्यापक सहभागिता और आगे की राह

इस विचार-विमर्श में अनुसूचित जनजाति समुदाय से डॉ. विक्रांत भूरिया, सज्जन सिंह वर्मा, हीरालाल अलावा, ओंकार सिंह मरकाम सहित कई प्रमुख नेता और विचारक शामिल हुए। वहीं अनुसूचित जाति समुदाय से फूल सिंह बरैया, चंद्रभान प्रसाद, प्रो. श्याम बाबू, डॉ. (मेजर) मनोज राजे समेत अनेक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता दिग्विजय सिंह ने की। डॉ. (मेजर) मनोज राजे ने कहा कि भोपाल डिक्लेरेशन-2 एससी-एसटी समुदायों के सामाजिक और आर्थिक कल्याण की दिशा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित होगा। वरिष्ठ आदिवासी नेता मोहिंदर सिंह कंवर ने इसे दलित-आदिवासी समुदायों की सामूहिक चेतना और संवैधानिक संकल्प की अभिव्यक्ति बताया।

आयोजकों के अनुसार, सभी सुझावों को समेटने के बाद वर्ष 2027 में भोपाल डिक्लेरेशन-2 का अंतिम मसौदा जारी किया जाएगा, जो आने वाले वर्षों में दलित और आदिवासी समुदायों के अधिकारों की लड़ाई को नई दिशा देगा।