वाराणसी में मणिकर्णिका घाट का पुनर्निर्माण, संकट में अहिल्याबाई होलकर की 254 साल पुरानी विरासत

254 साल पहले 1771 में देवी अहिल्या द्वारा वाराणसी में निर्मित मणिकर्णिका घाट के एक हिस्से को जमींदोज कर दिया गया है। यहां श्मशान घाट बनाए जाने के प्रोजेक्ट के चलते इसे तोड़ा गया है। इसे लेकर देवी अहिल्या के वंशज और समाज के लोगों में नाराजगी है।

वाराणसी में मणिकर्णिका घाट का पुनर्निर्माण, संकट में अहिल्याबाई होलकर की 254 साल पुरानी विरासत
Varanasi Manikarnika Ghat

वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर चल रहे पुनर्निर्माण और सौंदर्यीकरण के कार्य ने हाल ही में विवाद का रूप ले लिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों में देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा 254 साल पहले बनाए गए मंदिरों की मूर्तियां हटाई हुई और घाट पर बिखरी हुई नजर आ रही हैं। इन तस्वीरों के सामने आने के बाद देशभर में विरोध की आवाज़ें उठ रही हैं, और कई सामाजिक व धार्मिक संगठनों ने घाट और वहां मौजूद ऐतिहासिक प्रतिमाओं को सम्मानपूर्वक संरक्षित करने की मांग की है।

घाट का पुनर्निर्माण और अहिल्या की विरासत

इंदौर स्थित अहिल्या उत्सव समिति के उपाध्यक्ष सुधीर देड़गे ने कहा कि वे विकास कार्य के विरोध में नहीं हैं, लेकिन मणिकर्णिका घाट पर मंदिरों, घाट और प्रतिमाओं की गरिमा बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि निर्माण कार्य के बाद सभी प्रतिमाओं को विधिवत और सम्मानपूर्वक पुनः मंदिरों में स्थापित किया जाना चाहिए, ताकि धार्मिक भावनाओं को ठेस न पहुंचे।

मणिकर्णिका घाट, जो काशी के 84 प्रमुख घाटों में शामिल है, हिंदू धर्म में अत्यंत आस्था का केंद्र माना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि इसी स्थान पर माता पार्वती की कान की मणि गिरी थी, इसलिए इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा। घाट पर पारंपरिक पत्थर की सीढ़ियां, धार्मिक प्रतीक और शिल्पकला के अवशेष मौजूद हैं। 1771 में देवी अहिल्याबाई होलकर ने इस घाट पर कई मंदिर, धर्मशाला, अन्न क्षेत्र और स्नान घाट का निर्माण कराया था, ताकि तीर्थ यात्रियों को सुविधाएं मिल सकें।

हालांकि, हाल ही में मणिकर्णिका घाट के एक हिस्से को श्मशान घाट बनाने के प्रोजेक्ट के लिए तोड़ा गया है। 18 करोड़ रुपये से चल रहे इस विकास कार्य के तहत 29,350 वर्ग मीटर क्षेत्र में निर्माण हो रहा है। मिट्टी दलदली होने के कारण निर्माण के लिए 15 से 20 मीटर नीचे तक पाइलिंग की गई है, ताकि बाढ़ जैसी आपदा के दौरान घाट की संरचना सुरक्षित रहे।

देवी अहिल्या के वंशज और समाज के लोगों में नाराजगी

देवी अहिल्याबाई होलकर की संपत्तियों की देखरेख के लिए बनाए गए खासगी देवी अहिल्याबाई होलकर चैरिटीज़ ट्रस्ट के अध्यक्ष यशवंतराव होलकर ने इस मामले में कहा कि विकास कार्य आवश्यक हैं, लेकिन इसे देवी अहिल्याबाई की दूरदर्शिता और विरासत का सम्मान करते हुए किया जाना चाहिए था। उन्होंने प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से लापरवाही की जांच, दोषियों पर कार्रवाई और मूर्तियों को ट्रस्ट को सौंपने का आग्रह किया है, ताकि उनका विधिवत पुनः प्रतिष्ठापन किया जा सके।

वाराणसी प्रशासन की इस कार्रवाई पर इंदौर में भी नाराजगी देखी जा रही है। यहां अहिल्याबाई होलकर के वंशज और विभिन्न समाजों जैसे धनगर, पाल और बघेल ने 15 जनवरी को बैठक बुलाकर रणनीति तय करने का निर्णय लिया है। उनका कहना है कि त्रिशताब्दी वर्ष के समापन के समय उनकी विरासत का ऐसा अनादर आहत करने वाला है।

देवी अहिल्या के अच्छे कार्यों को इस तरह ध्वस्त करना दुखद

इतिहासकार जफर अंसारी ने कहा कि देवी अहिल्या के अच्छे कार्यों को इस तरह ध्वस्त करना दुखद है। उन्होंने बताया कि इस घाट पर देवी अहिल्याबाई ने 5 करोड़ रुपये की लागत से 21 मंदिर, धर्मशाला, अन्न क्षेत्र और स्नान घाट बनवाए थे। इन संरचनाओं का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ा हुआ है।

कानूनी रूप से भी इस तरह के निर्माण कार्यों पर सख्त निगरानी है। प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम (AMASR), 1958 के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को राष्ट्रीय विरासत से जुड़े स्मारकों की सुरक्षा, संरक्षण और उनके आसपास होने वाली गतिविधियों को नियंत्रित करने का अधिकार है। अधिनियम के अंतर्गत स्मारकों के चारों ओर 100 मीटर का प्रतिबंधित क्षेत्र और 200 मीटर का नियंत्रित क्षेत्र निर्धारित है, ताकि अनधिकृत निर्माण रोका जा सके। 2010 में इस अधिनियम में संशोधन कर इन प्रतिबंधित क्षेत्रों में निर्माण पर रोक को और सख्त किया गया।

स्थानीय लोगों और वंशजों का कहना है कि मूर्तियों को बिना सूचना के हटाना और निर्माण करना स्वीकार्य नहीं है। संजय मिश्रा और मयंक पाल जैसे नागरिकों ने प्रशासन से अनुरोध किया है कि हटाई गई प्रतिमाएं उन्हें वापस की जाएं और विधिवत पुनः स्थापित की जाएं। उन्होंने चेतावनी भी दी है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे आंदोलन करने के लिए तैयार हैं।

मणिकर्णिका घाट का पुनर्निर्माण विवादित

इस मामले पर प्रशासन का कहना है कि कोई मूर्ति नहीं टूटी है और कार्य प्रशासन की देखरेख में हो रहा है। स्थानीय लोगों की बात सुनी गई और बाहरी विरोध को समझाकर वापस कर दिया गया।

नई योजना के तहत श्मशान घाट पर 25 मीटर ऊंची चिमनी, पवित्र जलकुंड, अपशिष्ट ट्रॉलियां, मुंडन क्षेत्र, पांच बर्थ वाले दाह संस्कार प्लेटफॉर्म, सेवा क्षेत्र, पंजीकरण कक्ष और सामुदायिक शौचालय बनाए जाएंगे। निर्माण कार्य में चुनार और जयपुर के पत्थरों का उपयोग किया जाएगा।

इस पूरी घटना ने यह सवाल उठाया है कि विकास कार्य और धार्मिक तथा ऐतिहासिक विरासत के बीच संतुलन कैसे रखा जाए। मणिकर्णिका घाट जैसी ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जगह पर सुधार कार्य होते समय स्थानीय समुदाय, समाज और ट्रस्टों की भावनाओं का सम्मान करना जरूरी है।

वाराणसी प्रशासन और सरकार पर अब यह जिम्मेदारी बनती है कि वे विकास कार्य को सुचारू रूप से चलाते हुए, देवी अहिल्याबाई होलकर की विरासत और धार्मिक भावनाओं का सम्मान सुनिश्चित करें।