क्या कानून बन गया है सजा? SC के जज बोले; ज्यूडिशियरी हो रही ज्यादा सख्त, लोग बेवजह जेलों में
सुप्रीम कोर्ट के जज Justice Ujjwal Bhuyan ने न्यायपालिका के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि ज्यूडिशियरी का एक हिस्सा जरूरत से ज्यादा सख्ती दिखा रहा है, जिसके कारण आम लोग लंबे समय तक जेलों में बंद रह जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने न्यायपालिका में "मोर लॉयल देन द किंग सिंड्रोम" की समस्या पर जोरदार टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के कुछ हिस्से इतने सख्त हो गए हैं कि इससे लोग महीनों- तक जेल में सड़ते रहते हैं, जो विकसित भारत के आदर्श से मेल नहीं खाता। यह बात उन्होंने रविवार (22 मार्च 2026) को बेंगलुरु में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पहली नेशनल कॉन्फ्रेंस में "विकसित भारत में न्यायपालिका की भूमिका" विषय पर पैनल डिस्कशन के दौरान कही।
मुख्य बातें जस्टिस भुइयां की स्पीच से:
मोर लॉयल देन द किंग सिंड्रोम:
न्यायपालिका के कई सदस्य "राजा से ज्यादा वफादार" बन गए हैं, जिसके कारण बेल देने में अनावश्यक सख्ती बरती जाती है। नतीजा अंडरट्रायल कैदी लंबे समय तक जेल में रहते हैं।
PMLA और UAPA का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल:
प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) एक शक्तिशाली हथियार है, लेकिन इसका ओवरयूज होने से इसकी प्रभावशीलता कम हो रही है। UAPA को "ड्रैकोनियन लॉ" बताते हुए कहा कि दोषसिद्धि दर महज 5% या उससे कम है, फिर भी आरोपी सालों तक जेल में क्यों रखे जाते हैं?
छोटे-मोटे मुद्दों पर क्रिमिनल केस: विरोध प्रदर्शन, सोशल मीडिया पोस्ट जैसी बातों पर मनमाने ढंग से केस दर्ज किए जाते हैं, जिससे सिस्टम पर बोझ बढ़ता है। सुप्रीम कोर्ट को ऐसे मामलों में SIT बनानी पड़ती है, जो सिर्फ समय की बर्बादी है।

विकसित भारत से दूरी:
"विकसित भारत" एक राजनीतिक नारा है। न्यायपालिका को इससे ज्यादा जुड़ना नहीं चाहिए। अदालतें न तो हमेशा आलोचक बनें और न ही चीयरलीडर—वे लोकतंत्र की संतरी बनी रहें। सामाजिक न्याय पर जोर: दलितों के साथ भेदभाव बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। जैसे- दलित महिला के हाथ का खाना न खाने की जिद, या दलित पुरुषों पर पेशाब करने जैसी घटनाएं विकास के मॉडल नहीं हो सकतीं। व्यक्ति के सम्मान की रक्षा जरूरी है।
यह स्पीच बार एंड बेंच, लाइव लॉ, द हिंदू जैसी विश्वसनीय रिपोर्ट्स में छपी है, जहां जस्टिस भुइयां ने न्यायिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों पर बल दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि ऐसी सख्ती और ओवरयूज से न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
यह टिप्पणी न्यायपालिका की आंतरिक चुनौतियों और कानूनों के दुरुपयोग पर एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ती है।

