क्या बांग्लादेश भारत के लिए एक और पाकिस्तान बनेगा!
इंकलाब मंच के संयोजक और प्रवक्ता उस्मान हादी की मौत के बाद बांग्लादेश में हालात अचानक हाथ से निकलते चले गए. जैसे ही उनकी मौत की खबर फैली, गुस्साई भीड़ सड़को पर उतर आई
इंकलाब मंच के संयोजक और प्रवक्ता उस्मान हादी की मौत के बाद बांग्लादेश में हालात अचानक हाथ से निकलते चले गए. जैसे ही उनकी मौत की खबर फैली, गुस्साई भीड़ सड़को पर उतर आई.. लेकिन ये गुस्सा सिर्फ अचानक नहीं था. कुछ ही समय में हिंसा पूरी तरह संगठित होती दिखी. इस हिंसा का निशाना बने देश के जाने-माने मीडिया संस्थान प्रथम आलो और द डेली स्टार, और साथ ही मशहूर सांस्कृतिक संस्था छाया नट. दफ्तरों में तोड़फोड़ हुई. आग लगाई गई और खुलेआम हमले किए गए. हमलावरों का आरोप था कि ये संस्थान भारत के एजेंट हैं. और फासीवादी ताकतों का समर्थन करते हैं.

होता रहा है बांग्लादेश में भारत का विरोध
अब समझने वाली बात है कि भारत का बांग्लादेश में विरोध कोई नई बात नहीं है. हालाकिं बांग्लादेश आजादी में भारत की भुमिका को हमेशा मानता है. लेकिन बाद के सालों में सीमा विवाद, कथित हत्याएं, पानी का बंटवारा और आंतरिक मामलों में दखल जैसे आरोपों के चलते ये भावनाएं बार-बार उभरती रही हैं. और फिर सत्ता की लड़ाई ने इन भावनाओं को अक्सर हथियार की तरह इस्तेमाल किया है. उस्मान हादी की मौत के बाद जो हिंसा हुई, उसे भी इसी नजरिए से देखा जा रहा है.

पिछले 16 महीनों से देश चला रही अंतरिम सरकार के दौरान कानून- व्यवस्था लगातार सवालों में रही है. कई विशेषज्ञ मानते हैं कि इस अस्थिरता से निकलने का एक ही रास्ता है. निष्पक्ष और समय पर चुनाव. लेकिन इसी बीच ये आशंका भी है कि कुछ गुट चुनाव से पहले माहौल बिगाड़ने के लिए भारत विरोधी भावनाओं को जानबूझकर हवा दे रहे हैं, ताकि हिंसा और अराजकता के जरिये राजनीतिक फायदा उठाया जा सके...पिछले साल जुलाई में हुए जन आंदोलन के बाद हालात और उलझ गए. उस आंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना और आवामी लीग के कई नेता भारत आ गए... जिसका परिणाम ये हुआ भारत और बांग्लादेश के बीच रिश्तों में मौजूद तनाव बढ़ गया. और भारत विरोधी राजनीति को नया मुद्दा मिल गया.
भारत और बांग्लादेश के बीच कुटनीतिक तनाव
हादी की हत्या के बाद सोशल मीडिया पर ये अफवाह भी फैलाई गई कि आरोपी भारत भाग गए हैं. इसके बाद भारत और बांग्लादेश के बीच डिप्लोमेटिक टेंशन और बढ़ गई. हालांकि प्रशासन कह रहा है कि आरोपियों के देश छोड़ने का कोई ठोस सबूत अब तक नहीं मिले हैं. हादी की मौत के बाद हुए प्रदर्शनों में कुछ छात्र और धार्मिक संगठनों के नेताओं के बयान भी काफी विवादित रहे. कुछ सभाओं में खुलेआम मीडिया और सांस्कृतिक संस्थाओं को बंद करने या खत्म करने की धमकियां दी गईं. बाद में सफाई दी गई कि उनका मकसद हिंसा नहीं था, बल्कि कथित राजनीतिक पक्षपात और सांस्कृतिक वर्चस्व का विरोध करना था. वहीं कुछ संगठनों का कहना है कि उनकी बातों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है, और हमलों का दोष जबरन उन पर डाला जा रहा है..
इन सबके बीच एक बात जो साफ दिखी वो भारत विरोधी नारे. जानकारों का कहना है कि धर्म आधारित राजनीति को आगे बढ़ाने वाले समूहों के लिए ये नारे सबसे आसान हथियार बन चुके हैं. बाहरी दुश्मन दिखाकर लोकतांत्रिक संस्थाओं, स्वतंत्र मीडिया और सांस्कृतिक ढांचे पर हमलों को जायज ठहराया जा रहा है. हमलों के बाद मीडिया संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों ने आरोप लगाया कि उन्होंने पहले ही सरकार से मदद मांगी थी, लेकिन समय पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.

प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, सुरक्षा बल मौके पर मौजूद होने के बावजूद भीड़ को रोकने की गंभीर कोशिश नहीं की गई.. यही वजह है कि अब सरकार की भूमिका पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं. कई विश्लेषकों का मानना है कि ये सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि अंतरिम सरकार की गंभीर नाकामी को दिखाता है. छाया नट ने सैकड़ों अज्ञात लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है, और मीडिया संस्थानों पर हमले के मामले में कुछ गिरफ्तारियां भी हुई हैं. लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में सुरक्षा बलों के रवैये को लेकर बहस अभी भी जारी है कुल मिलाकर, उस्मान हादी की मौत के बाद भड़की हिंसा ने न सिर्फ बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति को कमजोर किया है, बल्कि ये भी दिखाया है कि कैसे भारत विरोधी भावनाओं का इस्तेमाल करके मीडिया, लोकतांत्रिक संस्थानों और सांस्कृतिक पहचान पर हमला किया जा रहा है. अब सवाल यही है क्या ये सब सिर्फ गुस्से का नतीजा है, या फिर इसके पीछे एक सोची-समझी राजनीतिक चाल है? आप क्या सोचते हैं.
shivendra 
