भोपाल की हवा पर NGT सख्त, आखिर प्रदूषण रोकने में चूक कहां हो रही है?
भोपाल में PM10 का स्तर घटा, लेकिन अब भी तय सीमा से काफी ज्यादा; इंदौर में बढ़ा प्रदूषण. सड़क की धूल, निर्माण कार्य और वाहनों का धुआं बड़ी वजह. NGT ने अधिकारियों से दो हफ्ते में मांगा जवाब.
Bhopal Air Pollution: भोपाल को झीलों का शहर कहा जाता है. यहां की पहचान बड़े तालाब, हरियाली और खूबसूरत नजारों से है. लेकिन शहर की एक दूसरी तस्वीर भी है. सड़कों पर उड़ती धूल, निर्माण वाली जगहों पर फैला मलबा, ट्रैफिक का धुआं और कई इलाकों में कचरा जलाने की शिकायतें. ऐसे में सवाल उठता है कि जब शहर में प्रदूषण रोकने के लिए सरकारी योजनाएं चल रही हैं, विभाग काम करने का दावा भी कर रहे हैं, करोड़ों खर्च भी किए जा रहे हैं, तो फिर हवा को साफ रखने में परेशानी क्यों आ रही है?
National Green Tribunal ने दिखाई सख्ती
अब इस मामले में राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी National Green Tribunal (NGT) ने भी सख्ती दिखाई है. 13 अक्टूबर 2026 को भोपाल स्थित NGT की केंद्रीय क्षेत्रीय पीठ ने मध्य प्रदेश में वायु प्रदूषण को लेकर सुनवाई की. अधिकरण ने संबंधित विभागों को दो हफ्ते के भीतर अपना जवाब देने के निर्देश दिए.
यह मामला राशिद नूर खान बनाम मध्य प्रदेश सरकार और अन्य से जुड़ा है. सुनवाई के दौरान प्रदूषण कम करने के लिए उठाए जा रहे कदमों, सरकारी योजनाओं और वायु गुणवत्ता के आंकड़ों पर चर्चा हुई. NGT ने साफ कहा कि सिर्फ योजना बनाने से काम नहीं चलेगा. जमीन पर काम होना चाहिए, नियमित निगरानी होनी चाहिए और तय समय में निर्देशों का पालन भी होना चाहिए.

18 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
लेकिन इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है. जब प्रदूषण की वजहें पहले से पता हैं और उसे रोकने के लिए योजनाएं भी मौजूद हैं, तो फिर भोपाल की हवा कितनी साफ हुई?
भोपाल में प्रदूषण कितना कम हुआ?
NGT के सामने पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, भोपाल में PM10 का सालाना औसत स्तर 2023-24 में 113 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था. 2024-25 में यह घटकर 110 रह गया. यानी एक साल में करीब 2.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई. सुनने में यह सुधार लगता है, लेकिन पूरी तस्वीर समझना जरूरी है. भारत में PM10 का सालाना औसत मानक 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है. इस हिसाब से भोपाल में 110 का स्तर तय सीमा से अब भी काफी ज्यादा था. दूसरी तरफ, इंदौर में PM10 का सालाना औसत स्तर 2023-24 में 99 था, जो 2024-25 में बढ़कर 108 हो गया. यानी भोपाल में थोड़ी गिरावट दर्ज हुई, जबकि इंदौर में स्तर बढ़ा.

अब यहां एक बात समझना जरूरी है. PM10 हवा में मौजूद धूल और दूसरे छोटे कणों को मापने का एक पैमाना है. ये कण इतने छोटे होते हैं कि सांस के साथ हमारे शरीर में जा सकते हैं. सड़क की धूल, निर्माण कार्य और कुछ तरह के धुएं से ऐसे कण हवा में फैल सकते हैं. वहीं, AQI यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स बताता है कि कुल मिलाकर हवा की हालत कैसी है. अच्छी, ठीक-ठाक या खराब.
सीधी और सराल भाषा में कहें तो PM10 हवा में मौजूद एक खास तरह के प्रदूषण की मात्रा बताता है, जबकि AQI हवा की कुल गुणवत्ता समझने में मदद करता है.
क्भों हो रही भोपाल की हवा खराब?
अब सवाल है कि हवा में यह प्रदूषण आ कहां से रहा है? NGT की सुनवाई में पेश किए गए अध्ययन के मुताबिक, भोपाल में सड़क की धूल, वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्य और खुले में कचरा जलाना प्रदूषण की बड़ी वजहों में शामिल हैं. इनमें से कई चीजों पर सरकारी विभाग कार्रवाई करके प्रदूषण कम कर सकते हैं. लेकिन इसके लिए लगातार काम करना जरूरी है.

1. सड़कों पर उड़ती धूल
भोपाल की सड़कों पर कई जगह मिट्टी जमा रहती है. कहीं सड़क के किनारे कच्चे हैं, कहीं फुटपाथ टूटे हुए हैं और कहीं निर्माण के कारण मिट्टी और मलबा सड़क पर फैल जाता है. जब इन सड़कों से गाड़ियां गुजरती हैं, तो मिट्टी के छोटे-छोटे कण हवा में उड़ने लगते हैं. ऐसे में सिर्फ झाड़ू लगाकर सड़क साफ कर देना काफी नहीं है. जहां जरूरत हो, वहां ऐसी मशीनों से सफाई करनी चाहिए जो धूल को खींचकर इकट्ठा कर सकें. सड़क के किनारों पर जमा मिट्टी हटाना और फुटपाथों की मरम्मत करना भी जरूरी है.
अब सवाल यह है कि भोपाल में ऐसी कितनी मशीनें हैं? वे रोज किन सड़कों पर चलती हैं? जिन इलाकों में सबसे ज्यादा धूल उड़ती है, वहां कितनी बार सफाई होती है? इन सवालों के जवाब नगर निगम से लेने होंगे.
2. निर्माण कार्य से कितनी धूल उड़ रही है?
शहर में सड़क, मेट्रो, फ्लाईओवर और इमारतें बनाने का काम चलता रहता है. लेकिन इन कामों के दौरान अगर रेत, मिट्टी, सीमेंट और मलबे को खुले में छोड़ दिया जाए, तो धूल हवा में फैल सकती है. निर्माण वाली जगह पर रेत और मिट्टी को ढककर रखना चाहिए. सीमेंट की बोरियों को सुरक्षित जगह पर रखना चाहिए. मलबे को सड़क पर फैलने से रोकना चाहिए और उसे सही जगह पहुंचाने की व्यवस्था होनी चाहिए. जहां जरूरत हो, वहां धूल रोकने के लिए कवर, नेट और दूसरे जरूरी इंतजाम भी होने चाहिए.
अक्टूबर 2026 में भोपाल के प्रभात चौराहा से रत्नागिरी और BHEL इलाके में निर्माण के कारण धूल उड़ने की समस्या को लेकर खबरें भी प्रकाशित हुई हैं.
लेकिन अब असली सवाल यह है कि इन जगहों पर अभी क्या स्थिति है? क्या निर्माण एजेंसियां नियमों का पालन कर रही हैं? क्या अधिकारियों ने मौके पर जाकर जांच की? अगर नियमों का पालन नहीं हुआ, तो क्या कोई नोटिस या जुर्माना लगाया गया? इन सवालों के जवाब सिर्फ कागजों से नहीं, बल्कि मौके पर जाकर भी तलाशने होंगे.

3. खुले में कचरा जलाने पर रोक क्यों जरूरी है?
कई बार सड़कों के किनारे या खाली जगहों पर कचरा और सूखे पत्ते जला दिए जाते हैं. इससे निकलने वाला धुआं हवा को प्रदूषित करता है. अगर किसी इलाके में बार-बार कचरा जलाया जा रहा है, तो सिर्फ एक बार उसे बुझा देना काफी नहीं है. यह देखना होगा कि वहां कचरा जमा क्यों हो रहा है, उसे उठाने की व्यवस्था कैसी है और दोबारा कचरा जलाने से रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं. इस मामले में नगर निगम की भूमिका अहम है.
कितनी शिकायतें मिलीं? कितनी शिकायतों पर कार्रवाई हुई? कितने लोगों पर जुर्माना लगा? और क्या जिन जगहों पर पहले कचरा जलाया जाता था, वहां अब यह बंद हो गया है? इनका जवाब मिलने पर ही पता चलेगा कि कार्रवाई का कितना असर हुआ.
4. गाड़ियों से निकलने वाला धुआं
सड़कों पर चलने वाले वाहन भी हवा को प्रदूषित करते हैं. इसलिए गाड़ियों की जांच, प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र के नियमों का पालन और ट्रैफिक को बेहतर तरीके से चलाना जरूरी है. लेकिन सिर्फ सड़क पर गाड़ियों की भीड़ देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रदूषण में उनका कितना योगदान है. इसके लिए प्रदूषण से जुड़े आंकड़े और तकनीकी अध्ययन देखना जरूरी है. परिवहन विभाग और ट्रैफिक पुलिस से यह जानकारी ली जा सकती है कि कितनी गाड़ियों की जांच हुई, कितने चालान काटे गए और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई.
प्रदूषण कम करने के लिए मिले पैसे का क्या हुआ?
इस मामले में एक और अहम सवाल सरकारी बजट को लेकर है. भोपाल में हवा साफ रखने के लिए नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम यानी NCAP के तहत भी काम किया जाता है. इस कार्यक्रम का मकसद शहरों में प्रदूषण कम करना है. इसके तहत सड़क की सफाई, धूल पर नियंत्रण, कचरा प्रबंधन और प्रदूषण कम करने से जुड़े दूसरे काम किए जा सकते हैं.
अगस्त 2026 में NGT की सुनवाई को लेकर प्रकाशित खबरों में भोपाल नगर निगम के खर्च का मुद्दा भी उठा था. खबरों के मुताबिक, 2024-25 में नगर निगम ने इस योजना के तहत उपलब्ध फंड में से 12.44 करोड़ खर्च किए थे. यह उस अवधि में उपलब्ध बताए गए फंड का करीब 21.18 प्रतिशत था. यानी खर्च को लेकर सवाल उठे थे और NGT ने इस बारे में जानकारी मांगी थी.
लेकिन यहां यह समझना भी जरूरी है कि कम पैसा खर्च होना अपने आप में गड़बड़ी या भ्रष्टाचार का सबूत नहीं है. यह जानना जरूरी है कि पैसा कब मिला, किन कामों के लिए मिला, कितना खर्च हुआ और बाकी राशि खर्च क्यों नहीं हुई. अब सवाल यह है कि जिन कामों के लिए पैसा खर्च किया गया, उनका असर कहां दिखाई दे रहा है?
क्या सड़क की धूल कम हुई? क्या सफाई के लिए मशीनें खरीदी गईं और वे काम कर रही हैं? क्या कचरा जलाने की घटनाओं में कमी आई? क्या प्रदूषण के आंकड़ों में सुधार हुआ? इन सवालों के जवाब नगर निगम के बजट, खर्च के रिकॉर्ड और मौके की जांच से मिल सकते हैं.
हवा की जांच करने वाले केंद्र कितने कारगर हैं?
प्रदूषण कम करने के लिए यह जानना भी जरूरी है कि हवा में प्रदूषण कितना है. इसके लिए शहर में वायु गुणवत्ता की निगरानी करने वाले केंद्र लगाए जाते हैं. इन्हें CAAQMS कहा जाता है. ये केंद्र हवा में मौजूद कुछ प्रदूषकों की लगातार निगरानी करते हैं. NGT की सुनवाई में ऐसे केंद्रों की संख्या बढ़ाने और उन्हें सही जगह पर लगाने की जरूरत पर भी जोर दिया गया.
लेकिन सिर्फ केंद्र लगा देने से काम पूरा नहीं होता. यह भी देखना जरूरी है कि वे चालू हैं या नहीं, उनका डेटा नियमित रूप से मिल रहा है या नहीं और शहर के प्रदूषण वाले इलाकों की स्थिति समझने के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध है या नहीं.
मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से यह पूछा जा सकता है कि भोपाल में कितने निगरानी केंद्र हैं, उनमें से कितने चालू हैं और क्या किसी केंद्र में तकनीकी खराबी के कारण आंकड़े दर्ज नहीं हो पा रहे हैं. इन जानकारियों से यह समझने में मदद मिलेगी कि शहर की हवा पर नजर रखने की व्यवस्था कितनी मजबूत है.
त्योहारों पर प्रदूषण रोकने के लिए क्या इंतजाम हैं?
NGT ने त्योहारों के दौरान पटाखों से होने वाले वायु और ध्वनि प्रदूषण को लेकर भी नियमों का सख्ती से पालन कराने की बात कही है. इसके अलावा, हवा की गुणवत्ता खराब होने पर अलग-अलग स्तर के हिसाब से कार्रवाई करने की व्यवस्था भी है. इसे GRAP यानी ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान कहा जाता है. आसान भाषा में समझें तो जब हवा ज्यादा खराब होने लगती है, तो स्थिति के हिसाब से प्रदूषण कम करने के लिए अलग-अलग कदम उठाए जाते हैं. लेकिन ये कदम कब और कैसे लागू होंगे, यह उस समय के प्रदूषण स्तर और लागू सरकारी निर्देशों पर निर्भर करता है. इसलिए यह भी जांचना जरूरी है कि संबंधित विभागों के बीच तालमेल कैसा है और हवा की हालत खराब होने पर कार्रवाई की जिम्मेदारी किसकी है.
NGT ने अधिकारियों से क्या कहा?
13 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान अधिकारियों की तरफ से बताया गया कि प्रदूषण रोकने के लिए बैठकें की जा रही हैं और सुधार के कदम उठाए जा रहे हैं. इसके बाद NGT ने संबंधित विभागों को दो हफ्ते के भीतर अपना विस्तृत जवाब देने के निर्देश दिए. अधिकरण ने पहले के आदेशों के पालन और प्रदूषण कम करने के लिए आगे की कार्रवाई की जानकारी भी मांगी. इसका मतलब है कि अब विभागों को यह बताना होगा कि उन्होंने क्या काम किया और आगे क्या करने जा रहे हैं. लेकिन इस मामले की असली तस्वीर तब सामने आएगी, जब इन दावों को जमीन पर जाकर देखा जाएगा.
अगर किसी सड़क की सफाई का दावा किया गया है, तो उस सड़क की स्थिति देखनी होगी. अगर निर्माण स्थल पर धूल रोकने के इंतजाम होने की बात कही गई है, तो मौके पर जाकर जांच करनी होगी. अगर कचरा जलाने की शिकायत पर कार्रवाई हुई है, तो उसका रिकॉर्ड देखना होगा. यानी सिर्फ अधिकारियों का जवाब पढ़ना काफी नहीं होगा. जवाब में किए गए दावों की जांच भी जरूरी है.
अब 18 नवंबर की सुनवाई पर नजर
भोपाल में वायु प्रदूषण से जुड़े इस मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर 2026 को तय है. इससे पहले यह जानना जरूरी होगा कि विभागों ने NGT के निर्देशों के मुताबिक क्या कार्रवाई की. कितनी सड़कों की सफाई हुई? निर्माण स्थलों पर क्या सुधार किए गए? खुले में कचरा जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए? प्रदूषण नियंत्रण के लिए मिले पैसे का कितना इस्तेमाल हुआ? और क्या इन कामों से हवा की गुणवत्ता में कोई सुधार दिखाई दिया? इन सवालों के जवाब सरकारी दस्तावेजों, अधिकारियों की प्रतिक्रिया और मौके की जांच से तलाशने होंगे. यह भी जरूरी है कि संबंधित विभागों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए. जहां किसी कमी का सबूत मिले, उसे सामने रखा जाए. और जहां कोई दावा साबित न हो पाए, वहां उसे साफ तौर पर बताया जाए.
आखिर भोपाल की हवा कब साफ होगी?
भोपाल में प्रदूषण रोकने की जिम्मेदारी सिर्फ एक विभाग की नहीं है. नगर निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, परिवहन विभाग, निर्माण एजेंसियों और जिला प्रशासन समेत कई विभागों को मिलकर काम करना होता है.
NGT की सख्ती के बाद अब सवाल सिर्फ योजनाओं और सरकारी दावों का नहीं, बल्कि उनके नतीजों का है. अगर सड़क की धूल कम करने के लिए मशीनें हैं, तो वे कहां काम कर रही हैं? अगर निर्माण स्थलों पर नियम लागू हैं, तो उनका पालन हो रहा है या नहीं? अगर कचरा जलाने पर रोक है, तो ऐसी घटनाएं दोबारा क्यों हो रही हैं? और अगर प्रदूषण कम करने के लिए पैसा खर्च किया गया है, तो उसका असर कहां दिखाई दे रहा है? इन सवालों का जवाब मिलने पर ही पता चलेगा कि भोपाल में प्रदूषण रोकने की कोशिशें कितनी असरदार रही हैं. फिलहाल नजर NGT की अगली सुनवाई और संबंधित विभागों की कार्रवाई रिपोर्ट पर है.

