सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच पर नया कानून बनाने से इनकार किया: कहा- हम संसद को निर्देश नहीं दे सकते

सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि संसद को कानून बनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मौजूदा कानून पर्याप्त हैं, लेकिन उनके लागू करने में कमी है।

सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच पर नया कानून बनाने से इनकार किया: कहा- हम संसद को निर्देश नहीं दे सकते

नई दिल्ली..सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हेट स्पीच (नफरत भरा भाषण) से जुड़ी कई याचिकाओं को खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि अदालत संसद को कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। नीति निर्माण और नया कानून बनाना पूरी तरह विधायिका (संसद और राज्य विधानसभाओं) का अधिकार क्षेत्र है। अदालत केवल जरूरत की ओर ध्यान दिला सकती है, लेकिन निर्देश नहीं दे सकती।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की दो सदस्यीय बेंच ने याचिकाकर्ताओं की मांग को ठुकराते हुए कहा कि मौजूदा कानूनी ढांचा हेट स्पीच जैसे मामलों से निपटने के लिए पूरी तरह सक्षम है। समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके लागू होने में देरी और असमानता है।

कोर्ट का मुख्य तर्क..
बेंच ने अपने आदेश में कहा कि हेट स्पीच को लेकर भारतीय कानून में कोई खालीपन (vacuum) नहीं है। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A, 153B, 295A, 505 आदि तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 66A (जो पहले रद्द हो चुकी है उसके बाद भी अन्य प्रावधान) और अन्य कानून पहले से ही नफरत फैलाने वाले भाषण, अफवाहें और साम्प्रदायिक तनाव भड़काने वाले कृत्यों से निपटने के लिए पर्याप्त प्रावधान रखते हैं।


कोर्ट ने जोर देकर कहा...
समस्या कानून की कमी की नहीं, बल्कि कानून के क्रियान्वयन की है। कई मामलों में पुलिस और प्रशासन समय पर कार्रवाई नहीं करते या फिर चयनात्मक (selective) तरीके से कार्रवाई करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की 5 अहम बातें..

अदालत का सीमित दायरा:
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसका काम नए अपराध परिभाषित करना या नया कानूनी ढांचा तैयार करना नहीं है। यह कार्य विधायिका का है। अदालत केवल मौजूदा कानूनों का सही क्रियान्वयन सुनिश्चित कर सकती है।

शक्तियों का विभाजन:
जहां पूरा कानूनी ढांचा मौजूद है, वहां अदालत को संयम बरतना चाहिए। न्यायपालिका को कार्यपालिका और विधायिका के क्षेत्र में अनावश्यक दखल नहीं देना चाहिए।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता:
संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत बोलने-लिखने की आजादी लोकतंत्र का आधार है, लेकिन यह असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, अन्य नागरिकों की गरिमा और सामाजिक सौहार्द की रक्षा के लिए उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

हेट स्पीच की निंदा:
कोर्ट ने हेट स्पीच को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विकृत रूप बताया। ऐसा भाषण जो समाज में नफरत फैलाए, समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ाए या सामाजिक तनाव पैदा करे, वह लोकतंत्र को कमजोर करता है।

सरकारों की जिम्मेदारी:
केंद्र और राज्य सरकारें अपनी समझ और बदलती परिस्थितियों के अनुसार तय कर सकती हैं कि नए कानून या संशोधन की जरूरत है या नहीं। कोर्ट ने 2017 की लॉ कमीशन रिपोर्ट (267वीं रिपोर्ट) का जिक्र भी किया, लेकिन उसे लागू करने का निर्देश नहीं दिया।

याचिकाओं की मांग क्या थी..
याचिकाओं में केंद्र सरकार को हेट स्पीच और अफवाहों पर सख्त नया कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मौजूदा कानून पर्याप्त नहीं हैं और सोशल मीडिया के युग में हेट स्पीच तेजी से फैल रही है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि कानून पर्याप्त हैं, बस उन्हें बिना पक्षपात और समय पर लागू करने की जरूरत है।

संदेश..
इस फैसले से एक बार फिर साफ हो गया है कि हेट स्पीच रोकने की असली चुनौती कानून बनाने की नहीं, बल्कि मौजूदा कानूनों को निष्पक्ष, तेज और प्रभावी तरीके से लागू करने की है। पुलिस, प्रशासन और न्याय व्यवस्था को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि कहीं स्पष्ट रूप से कानून लागू करने में जानबूझकर विफलता दिखती है, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। लेकिन सामान्य परिस्थितियों में संसद को कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव के बीच संतुलन बनाए रखने के संवैधानिक सिद्धांत को दोहराता है।