MP हाईकोर्ट का फैसला: 350 संविदा कर्मचारियों की 13 याचिकाएं खारिज,नहीं मिलेगा नियमितीकरण

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मनरेगा और पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन के करीब 350 संविदा कर्मचारियों की नियमितीकरण से जुड़ी 13 याचिकाएं खारिज कर दीं। जानिए कोर्ट ने क्या कहा।

MP हाईकोर्ट का फैसला: 350 संविदा कर्मचारियों की 13 याचिकाएं खारिज,नहीं मिलेगा नियमितीकरण

भोपाल। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने करीब 350 संविदा कर्मचारियों को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने नियमितीकरण की मांग को लेकर दायर 13 याचिकाओं को खारिज कर दिया है। इन याचिकाओं में मनरेगा और मध्य प्रदेश पुलिस आवास एवं बुनियादी ढांचा विकास निगम में काम करने वाले उप इंजीनियर शामिल थे। कर्मचारियों का कहना था कि वे पिछले 10 से 20 साल से संविदा पर सेवाएं दे रहे हैं, इसके बावजूद उन्हें नियमित नौकरी का लाभ नहीं मिल रहा है।

मुख्य न्यायाधीश अल्पेश वाई. कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि लंबे समय तक संविदा पर काम करने से किसी कर्मचारी को अपने आप नियमित नियुक्ति का अधिकार नहीं मिल जाता। कोर्ट ने नियमित भर्ती प्रक्रिया को रोकने और पहले सभी संविदा कर्मचारियों को नियमित करने की मांग स्वीकार नहीं की।

2022 की भर्ती प्रक्रिया को हाईकोर्ट में दी थी चुनौती

इस पूरे विवाद की शुरुआत 27 जुलाई 2022 को जारी भर्ती विज्ञापन से हुई थी। मध्य प्रदेश कर्मचारी चयन बोर्ड ने ग्रुप-3 के तहत उप इंजीनियर, ड्राफ्ट्समैन, टाइम कीपर और अन्य समान पदों पर नियमित भर्ती निकाली थी।

इस भर्ती प्रक्रिया का संविदा कर्मचारियों ने विरोध किया था। उनका कहना था कि लंबे समय से विभागों में काम करने के बावजूद उन्हें नियमित होने का अवसर नहीं दिया जा रहा है। कर्मचारियों ने मांग की थी कि सीधी भर्ती शुरू करने से पहले उनके नियमितीकरण पर विचार किया जाए। इसी मांग को लेकर देवेंद्र कुमार उपाध्याय सहित अन्य कर्मचारियों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल की थीं। बाद में ऐसी 12 अन्य याचिकाएं भी इसी मामले से जुड़ गईं।

कर्मचारियों ने 10 साल की सेवा का दिया हवाला

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने चयन प्रक्रिया के जरिए नौकरी हासिल की थी और वर्षों से विभागों में जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। कुछ कर्मचारियों की सेवा अवधि 20 साल तक पहुंच चुकी है।

कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट के उमा देवी फैसले का हवाला देते हुए कहा कि 10 साल या उससे अधिक समय तक काम करने वाले कर्मचारियों के नियमितीकरण पर विचार किया जाना चाहिए। उनका यह भी कहना था कि उम्र 35 से 55 साल के बीच होने के कारण अब उनके लिए नए उम्मीदवारों के साथ लिखित परीक्षा में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल है।

सरकार ने कहा- संविदा और नियमित पद अलग-अलग

राज्य सरकार ने कर्मचारियों की मांग का विरोध करते हुए कहा कि उनकी नियुक्तियां संविदा पदों पर निर्धारित शर्तों के तहत हुई थीं। नियुक्ति आदेशों में भी नियमितीकरण का कोई अधिकार नहीं दिया गया था।

सरकार ने यह भी बताया कि पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन में संविदा और नियमित कर्मचारियों के पद अलग-अलग हैं। वहीं, मनरेगा केंद्र सरकार से वित्तपोषित योजना है, जिसमें नियमित उप इंजीनियर के पद स्वीकृत नहीं हैं। ऐसे में संविदा पदों पर काम करने वाले कर्मचारी दूसरे नियमित पदों पर सीधे नियुक्ति का दावा नहीं कर सकते।

20 प्रतिशत आरक्षण को बताया था अपर्याप्त

संविदा कर्मचारियों ने 1 फरवरी 2020 के संशोधन का भी हवाला दिया था। इसके तहत नियमित भर्ती में संविदा कर्मचारियों के लिए 20 प्रतिशत पद आरक्षित किए गए थे। इसका लाभ कम से कम पांच साल की संविदा सेवा पूरी करने वाले कर्मचारियों को मिलना था। इसके अलावा संविदा में काम किए गए वर्षों के आधार पर अधिकतम 55 साल की उम्र तक आयु सीमा में छूट का प्रावधान था।

हालांकि, कर्मचारियों का तर्क था कि 20 प्रतिशत आरक्षण पर्याप्त नहीं है। उनकी मांग थी कि नियमित पदों पर सीधी भर्ती से पहले सभी पात्र संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण पर विचार किया जाए।

हाईकोर्ट ने 2018 की नीति और 2020 के संशोधन को माना वैध

अदालत ने सुनवाई के दौरान 5 जून 2018 की संविदा कर्मचारी नीति का भी उल्लेख किया। कोर्ट के अनुसार, कर्मचारियों ने नीति के कुछ प्रावधानों पर भरोसा किया, लेकिन इसके अन्य प्रावधानों को नजरअंदाज किया। नीति में नियमित भर्ती के दौरान संविदा कर्मचारियों को आरक्षण और आयु सीमा में छूट देने की व्यवस्था भी थी।

अदालत ने माना कि 2020 में किया गया संशोधन इसी नीति के अनुरूप था। इसलिए इसे असंवैधानिक या सरकार की अपनी नीति के खिलाफ नहीं कहा जा सकता।

2023 में संविदा कर्मचारियों का आरक्षण 50 प्रतिशत हुआ

हाईकोर्ट ने सरकार के 22 जुलाई 2023 के आदेश का भी जिक्र किया। इस आदेश के जरिए नियमित भर्ती में संविदा कर्मचारियों के लिए आरक्षण 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया गया था।

कोर्ट के सामने यह जानकारी भी रखी गई कि 2026 की भर्ती प्रक्रिया में उप इंजीनियर, ड्राफ्ट्समैन और समकक्ष पदों पर संविदा कर्मचारियों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। इसके तहत पात्र कर्मचारी निर्धारित नियमों के अनुसार भर्ती में शामिल हो सकते हैं और उन्हें आयु सीमा में भी छूट मिल सकती है।

उमा देवी और जग्गो मामले की दलील भी नहीं आई काम

कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट के उमा देवी और जग्गो बनाम भारत संघ (2024) के फैसलों का हवाला देकर राहत मांगी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि जग्गो मामले की परिस्थितियां अलग थीं। वहां कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गई थीं, जबकि मौजूदा मामले में नियमित भर्ती प्रक्रिया से उनकी संविदा सेवाएं समाप्त नहीं हो रही थीं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक संविदा पर काम करना अपने आप नियमित नियुक्ति का अधिकार नहीं देता। सरकार को नियमित भर्ती की प्रक्रिया और पात्रता तय करने का अधिकार है।

13 याचिकाएं खारिज, नियमित भर्ती का रास्ता साफ

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने संविदा कर्मचारियों की 13 याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने माना कि सरकार ने संविदा कर्मचारियों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण और आयु सीमा में छूट जैसी सुविधाएं दी हैं। ऐसे में नियमितीकरण के नाम पर भर्ती प्रक्रिया रोकने का आधार नहीं बनता।

इस फैसले के बाद संबंधित संविदा कर्मचारी सीधे नियमितीकरण की मांग के आधार पर राहत नहीं पा सकेंगे। हालांकि, वे निर्धारित आरक्षण और पात्रता नियमों के तहत नियमित भर्ती में शामिल हो सकते हैं।