पब्लिक वाणी खास खबर : चीते को गोली लगी, मॉनिटरिंग सेल सोता रहा, SOP तोड़ने वाले जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं

Public Vani Khas Khabar : एसओपी अनुसार, जब कोई चीता अपनी निर्धारित टेरिटरी से निकलकर दूसरे वन मंडल के क्षेत्र में पहुंचता है, तो मॉनिटरिंग सेल को संबंधित वन मंडल के मैदानी अमले को इसकी सूचना देना अनिवार्य है।

पब्लिक वाणी खास खबर : चीते को गोली लगी, मॉनिटरिंग सेल सोता रहा, SOP तोड़ने वाले जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं

गणेश पाण्डेय @ भोपाल

कूनो में चीते को गोली लगने और उसकी मौत के मामले में अब वन विभाग की निगरानी व्यवस्था की गंभीर खामियां सामने आ रही हैं। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि चीता मॉनिटरिंग के लिए बनाई गई एसओपी का घटना वाले दिन कथित तौर पर पालन ही नहीं किया गया। जिस व्यवस्था का उद्देश्य चीते की हर गतिविधि पर नजर रखना और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना था, वहीं मॉनिटरिंग व्यवस्था संकट के समय नाकाम साबित हुई।

एसओपी अनुसार, जब कोई चीता अपनी निर्धारित टेरिटरी से निकलकर दूसरे वन मंडल के क्षेत्र में पहुंचता है, तो मॉनिटरिंग सेल को संबंधित वन मंडल के मैदानी अमले को इसकी सूचना देना अनिवार्य है, ताकि उसकी निगरानी और सुरक्षा के लिए तत्काल जरूरी कदम उठाए जा सकें। लेकिन सूत्रों के मुताबिक, गोलीकांड वाले दिन मॉनिटरिंग सेल ने संबंधित वन मंडल के किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को सूचना नहीं दी। 

सवाल है कि जब चीते की लोकेशन और गतिविधियों की निगरानी की जा रही थी, तो सूचना देने की जिम्मेदारी किसने नहीं निभाई और क्यों? इससे भी ज्यादा गंभीर पहलू यह है कि घायल चीते को कूनो का स्टाफ कथित तौर पर तीन से चार घंटे तक देखता रहा, लेकिन समय रहते प्रभावी रेस्क्यू और उपचार की कार्रवाई नहीं हुई। इस दौरान घायल चीते की हालत और बिगड़ती गई। यदि यह जानकारी सही है तो यह महज मॉनिटरिंग की चूक नहीं, बल्कि घायल वन्यप्राणी को समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने में गंभीर लापरवाही का मामला बनता है।

अपनों को बचाने, दूसरों पर कार्रवाई

इस पूरे मामले में कार्रवाई की दिशा ने भी सवाल खड़े कर दिए हैं। चीते की सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी संभालने वाले कूनो के कर्मचारियों तथा वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की जांच करने के बजाय मुरैना और श्योपुर वन मंडलों के कर्मचारियों पर निलंबन की कार्रवाई की गई। सूत्रों का दावा है कि एसटीएफ ने गोलीकांड की जांच के दौरान कुनों के किसी भी संबंधित अधिकारी का बयान तक दर्ज नहीं किया और न ही मॉनिटरिंग सेल तथा रेस्क्यू में उनकी भूमिका की समुचित पड़ताल की। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जांच का दायरा जानबूझकर सीमित रखा गया? क्या एसओपी के उल्लंघन, सूचना नहीं देने और घायल चीते को समय पर उपचार नहीं मिलने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को जवाबदेही से बचाया जा रहा है? यदि दूसरे वन मंडल के कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय हो सकती है तो कूनों के मॉनिटरिंग सेल, फील्ड स्टाफ और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका जांच के दायरे में क्यों नहीं आई?

निलंबन आदेश भी हास्यपद है

चीता की सुरक्षा और निगरानी में नाकामी को छुपाने के लिए मुरैना और श्योपुर के दो रेंजर समेत 6 वन कर्मियों को निलंबित कर विभाग द्वारा बड़ी कार्रवाई करने का संदेश दिया। जल्दीबाजी में जारी किए मुख्य वन प्राणी अभिरक्षक डॉ. समिता राजौरा के प्रेसनोट और मुरैना के रेंजर, डिप्टी रेंजर और फॉरेस्ट गार्ड के निलंबन आदेश विरोधाभासी है। प्रेस-नोट में स्पष्ट लिखा है की घटना श्योपुर वन मंडल के पूर्व विजयपुर परिक्षेत्र में हुई। तब फिर मुरैना वनमंडल के रेंजर, डिप्टी डेंजर और फॉरेस्ट गार्ड का निलंबन क्यों हुआ, यह सवाल उठना लाजिमी है।

निलंबन आदेश की प्रति के अनुसार उसका मजमून है, वन्यप्राणी सुरक्षा के निर्देशों की पालना न करना, वनों की सुरक्षा, अवैध कटाई, अवैध शिकार, अवैध अतिक्रमण एवं वन परिक्षेत्र में वन्यप्राणियों की सुरक्षा में प्रभावी नियंत्रण न करने के फलस्वरूप चीता का अवैध शिकार होने के कारण श्री तोमर द्वारा अपने पदीय कर्तव्यों के प्रति घोर उदासीनता, लापरवाही एवं स्वच्छाचारिता बरती जाकर अनुशासनहीनता का परिचय दिया इनका यह कृत्य कदाचार की श्रेणी में आता है।

जांच में सवालों के जवाब जरूरी

  • घटना वाले दिन मॉनिटरिंग सेल ने संबंधित वन मंडल को सूचना क्यों नहीं दी?
  • एसओपी का उल्लंघन करने वाले मॉनिटरिंग सेल के कर्मचारियों पर क्या कार्रवाई हुई?
  • घायल चीते को तीन-चार घंटे तक देखने के बावजूद तत्काल रेस्क्यू और उपचार क्यों नहीं कराया गया? एसटीएफ ने कूनों के अधिकारियों और मॉनिटरिंग सेल के जिम्मेदार कर्मचारियों के बयान क्यों नहीं लिए?
  • दूसरे वन मंडलों के कर्मचारियों पर कार्रवाई से पहले कूनो प्रबंधन की जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई?
  • चीता संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे है, लेकिन जब एक चीता गोली लगने से घायल होकर जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा था, तब निगरानी तंत्र की भूमिका ही सवालों में है। अब जरूरत केवल कर्मचारियों को निलंबित करने की नहीं, बल्कि मॉनिटरिंग सेल से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक की जवाबदेही तय करने की है। वरना यह कार्रवाई दोषियों को पकड़ने के बजाय जिम्मेदारी नीचे के कर्मचारियों पर डालने की कवायद बनकर रह जाएगी।