पब्लिक वाणी खास खबर : कूनो से गांवों तक भटक रहे चीते जंगल में भोजन या सुरक्षा का संकट?
Public Vani Khas Khabar : गोली के छरों ने खोली निगरानी तंत्र की पोल, संरक्षित क्षेत्र की सीमा लांघकर मवेशियों का शिकार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी चीता प्रोजेक्ट को चमक के पीछे अब कूनो की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। संरक्षित क्षेत्र से बाहर निकलकर गांवों और दूसरे राज्यों तक पहुंच रहे चीते न केवल अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं, बल्कि ग्रामीणों के लिए भी परेशानी का सबब बनते जा रहे हैं। मवेशियों के शिकार से गांवों में दहशत और ग्रामीणों में नाराजगी बढ़ रही है। 19 माह के नर चीते केएनजी 22 की गोली के छरें लगने से हुई मौत ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कूनो और आसपास के जंगलों में चीतों के लिए पर्याप्त शिकार प्रजातियां, पानी और सुरक्षित विचरण क्षेत्र उपलब्ध हैं? यदि प्राकृतिक भोजन और अनुकूल आवास पर्याप्त हैं तो चीते बार-बार संरक्षित क्षेत्र से बाहर आबादी वाले इलाकों में क्यों पहुंच रहे हैं? पालतू मवेशियों को आसान शिकार बनाने की घटनाएं मानव-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ा रही हैं। चीते की मौत के तीन दिन बाद भी राज्य सरकार की ओर से जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। PCCF वन्यप्राणी डॉ. समिता राजौरा और केंद्रीय जांच एजेंसी की टीम का कूनो पहुंचना मामले की गंभीरता को दर्शाता है। लेकिन सवाल है कि क्या जांच केवल गोली चलाने वाले अज्ञात शिकारी तक सीमित रहेगी या निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक की भी जिम्मेदारी तय होगी?
हाथियों की मौत पर निलंबन, चीते की मौत पर अब तक खामोशी क्यों?
वन विभाग में जवाबदेही के पुराने उदाहरण भी इस मामले को महत्वपूर्ण बनाते हैं। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हाथियों की मौत के मामले में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर गौरव चौधरी और एसडीओ फतेह सिंह निनामा को निलंबित किया था। तत्कालीन पीसीसीएफ वन्यप्राणी वीएन अंबाड़े को भी पद से हटाया गया था। इसी तरह 2014-15 में रात के समय अज्ञात जीप की टक्कर से बाघ की मौत के बाद तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर सीके पाटिल और पीसीसीएफ वन्यप्राणी रवि श्रीवास्तव को पद से हटाया गया था। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब बाघ और हाथियों की मौत पर अधिकारियों की जवाबदेही तय हो सकती है, तो प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट से जुड़े चीते की गोली लगने से मौत पर कार्रवाई का इंतजार क्यों? क्या सरकार इस बार भी केवल जांच रिपोर्ट का इंतजार करेगी या निगरानी व्यवस्था की विफलता पर तत्काल जवाबदेही तय करेगी?
सीबीआई से जांच कराने की मांग
19 माह के नर चीते केएनजी 22 की मौत का मामला अब न्यायालय पहुंच गया है। वन्यप्राणी विशेषज्ञ एवं आरटीआई कार्यकता अजय दुबे ने मामले की केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से जांच कराने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ता ने मामले की गंभीरता को देखते हुए शीघ्र सुनवाई का अनुरोध भी किया है। चीते के शरीर में बंदूक के छरें मिले थे और उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। अब न्यायालय से यह उम्मीद की जा रही है कि घटना की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय करने के सवाल पर गंभीरता से विचार होगा।
6,800 वर्ग किलोमीटर का वन परिदृश्य चाहिए, तैयारियां कितनी
चीता परियोजना की चुनौती केवल चीतों का प्रजनन कर उनकी संख्या बढ़ाना नहीं है। उनके लिए पर्याप्त प्राकृतिक शिकार, पानी, सुरक्षित आवास और आपस में जुड़े जंगलों का विशाल नेटवर्क तैयार करना भी उतना ही जरूरी है। परियोजना की रिपोर्ट में कूनो के बाहर करीब 6,800 वर्ग किलोमीटर के जुड़े हुए वन परिदृश्य को विकसित करने की जरूरत बताई गई है। इसका उद्देश्य चीत्तों को प्राकृतिक रूप से विचरण करने के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध कराना है। लेकिन जमीनी स्थिति यह सवाल खड़ा कर रही है कि क्या इस दिशा में जरूरी तैयारियां पूरी हुई हैं?
संरक्षित क्षेत्र से बाहर निकलने वाले चीतों को दूसरे वन क्षेत्रों और राज्यों में सुरक्षित रखने की कोई प्रभावी निगरानी व्यवस्था है? क्या रेडियो कॉलर से मिलने वाले संकेतों पर तत्काल कार्रवाई होती है? गांवों के आसपास पहुंचने वाले चीतों और ग्रामीणों के बीच संघर्ष रोकने के लिए पर्याप्त तंत्र विकसित किया गया है?
केएनजी 22 की मौत ने स्पष्ट कर दिया है कि जंगल की सीमा से बाहर चीते के लिए खतरा केवल भूख या प्राकृतिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि इंसानी गतिविधियां और अवैध शिकार भी हैं। अब सरकार के सामने दोहरी चुनौती है-चीतों के लिए अनुकूल प्राकृतिक आवास और भोजन सुनिश्चित करना तथा संरक्षित क्षेत्र से बाहर उनकी सुरक्षा की जवाबदेही तय करना। अन्यथा प्रजनन और संख्या बढ़ाने के दावों के बीच चीतों की सुरक्षा सबसे कमजोर कड़ी बनी रहेगी।

