SFS को पदोन्नति देने के लिए 19 को DPC : जांच के फेर में फंसे एक दर्जन अफसरों पर संकट
डीपीसी के लिए भेजे गए 26 नामों में से संदिग्ध रिकॉर्ड वाले अफसरों की पात्रता पर रहेगी नजर
मध्यप्रदेश में राज्य वन सेवा (एसएफएस) के अधिकारियों को भारतीय वन सेवा (आईएफएस) बनाने के लिए डीपीसी 19 अक्टूबर को प्रस्तावित है। यह डीपीसी 19 पदों के लिए होने वाली है और इसके लिए कुल 26 अधिकारियों के नाम भेजे गए हैं। सामान्य तौर पर रिक्त पद की तुलना में तीन गुना नाम भेजे जाते हैं, लेकिन एसएफएस अफसरों के पात्र नहीं होने की वजह से सिर्फ 26 नाम भेजे गए हैं। इस बार पदोन्नति की राह में करीब एक दर्जन अधिकारियों का विभागीय रिकॉर्ड रोड़ा बन सकता है। आर्थिक अनियमितताओं, अवैध कटाई सहित अन्य गंभीर आरोपों से जुड़ी जांच के दायरे में आए अधिकारियों पर संकट मड़ाया हुआ है। खतरा यह है कि उनके लिफाफे बंद रखे जा सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वन विभाग इस बार सभी अभ्यर्थियों के सेवा रिकॉर्ड और लंबित जांचों की जानकारी पूरी पारदर्शिता से संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के सामने रखेगा या पिछली डीपीसी जैसा विवाद फिर खड़ा होगा। जंगल महकमे के सूत्रों की माने तो जिम्मेदार अफसरों ने पिछले साल की डीपीसी के बाद हुए विवाद से सबक नहीं लिया है। उन्होंने इस बार भी ऐसे अफसरों के नाम आईएफएस बनाने के लिए भेज दिए हैं, जिनके खिलाफ जांच चल रही है।
वन विभाग ने एसएफएस से आईएफएस में पदोन्नति के लिए 26 अधिकारियों के नाम यूपीएससी को भेजे हैं। एक दर्जन के करीब दागी हैं। जिन अफसरों के नाम भेजे गए हैं, उनमें 2009 बैच के रामकुमार अवधिया और मनोज कटारिया, 2011 बैच की प्रियंका चौधरी और सुरेश कुमार अहिरवार, 2012 बैच के संतोष कुमार रनसोरे, मनीषा पुरवार, प्रमोद सिंह, बालकराम सिरसाम, मान सिंह मरावी और एल्विन वर्मन, 2014 बैच के प्रदीप कच्छवा, फतेह सिंह निनामा, राकेश लहरी और अंतर सिंह ओहरिया, 2015 बैच के संजीव कुमार शर्मा, धीरज सिंह चौहान, गंगा प्रसाद कुदारे, 2016 बैच के अविनाश जोशी, हमीदुल्ला खान, संजय पाठक, संदेश माहेश्वरी, संदीप कुमार गौतम, जितेंद्र गुप्ता, संतोष कुमार शुक्ला, राजेश शर्मा एवं राहुल मिश्रा सहित अन्य अधिकारी शामिल हैं। इन अधिकारियों के मामलों में आरोपों की प्रकृति, जांच की वर्तमान स्थिति और लागू सेवा नियमों के आधार पर पदोन्नति संबंधी निर्णय होना है।
अब UPSC के सामने रिकॉर्ड की परीक्षा
DPC में फैसला केवल वरिष्ठता के आधार पर नहीं, बल्कि निर्धारित पात्रता, सेवा अभिलेख और लागू नियमों के अनुसार होगा। जिन अधिकारियों के मामलों में प्रतिकूल प्रविष्टियां, आरोप-पत्र या जांच संबंधी तथ्य हैं, उनकी स्थिति का सही आकलन महत्वपूर्ण होगा। सवाल यह भी है कि विभाग की ओर से जो सूची भेजी गई है, उसमें अधिकारियों से जुड़े संबंधित अभिलेखों का पूरा खुलासा किया गया है या नहीं। करीब एक दर्जन अधिकारियों के लिफाफे बंद होने की आशंका के बीच इस बार निगाहें सिर्फ पदोन्नति सूची पर नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया पर भी रहेगी, जिसके आधार पर आईएफएस बनाए जाने की पात्रता तय की जाएगी।
इनके लिफाफे बंद होने की संभावना
रामकुमार अवधिया, मनोज कटारिया, प्रियंका चौधरी, सुरेश कुमार अहिरवार, संतोष रनसोरे, बालक राम सिरसाम, मानसिंह मरावी, एल्विन बर्मन, प्रमोद सिंह, मनीषा पुरवार और अंतर सिंह ओहरिया। सबसे गंभीर मामला ओहरिया का है। उन पर कूटरचित दस्तावेज तैयार कर अपने नाते-रिश्तेदारों के खाते में डेढ़ लाख से अधिक की राशि डालने का आरोप है। एक महीने पहले से उनके खिलाफ एफआईआर कराने का प्रस्ताव विभाग द्वारा शासन को भेजा गया है, लेकिन अभी तक अनुमोदन नहीं मिला है। पिछली पदोन्नति प्रक्रिया के दौरान संतोष कुमार रनसोरे, बालकराम सिरसाम और मानसिंह मरावी के मामलों को लेकर गंभीर सवाल उठे थे।
आरोप लगे थे कि उनके सेवा रिकॉर्ड से जुड़ी प्रतिकूल जानकारियां समय पर सामने नहीं लाई गई, लिहाजा यूपीएससी से पदोन्नति की मंजूरी मिल गई। बाद में रामकुमार अवधिया की केंद्रीय सतर्कता आयोग और यूपीएससी में शिकायत की गई। उसके बाद मामले ने तूल पकड़ा था। लिहाजा अंतिम अधिसूचना में तीनों अधिकारियों के नाम शामिल नहीं किए गए और पदोन्नति की हरी झंड़ी मिलने के बाद उन्हें राज्य वन सेवा में वापस लौटना पड़ा।
इस घटनाक्रम ने विभागीय जांचों और पदोन्नति के लिए भेजे जाने वाले अभिलेखों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए थे। इस बार वन विभाग ने 26 अधिकारियों के नाम भेजे हैं। इनमें कई ऐसे अधिकारी ऐसे हैं, जिन पर गंभीर आरोप हैं और उनकी जांच चल रही हैं। रामकुमार अवधिया और मनोज कटारिया के नाम तीसरी बार भेजे जाने के कारण उनके मामलों पर भी नजर रहेगी।

