सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: SIR वैध, चुनाव आयोग को मिली क्लीन चिट

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार समेत कई राज्यों में चुनाव आयोग द्वारा कराए गए SIR को संवैधानिक और वैध करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट को साफ और निष्पक्ष बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग विशेष प्रक्रिया अपना सकता है। साथ ही संदिग्ध नागरिकता वाले हटाए गए नामों की रिपोर्ट 4 हफ्ते में केंद्र को भेजने के निर्देश दिए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: SIR वैध, चुनाव आयोग को मिली क्लीन चिट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्यों में चुनाव से पहले होने वाली वोटर लिस्ट की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को पूरी तरह वैध और संवैधानिक करार दिया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने साफ किया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित कराने के लिए चुनाव आयोग (ECI) के पास ऐसी विशेष प्रक्रिया अपनाने का पूरा अधिकार है और इसे किसी भी तरह से 'गैरकानूनी' या 'मनमाना' नहीं कहा जा सकता। इसके साथ ही देश की सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि संदिग्ध नागरिकता के आधार पर जिन भी लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काटे गए हैं, उनकी सूची 4 हफ्ते के भीतर केंद्र सरकार को सौंपी जाए।

5 बड़े सवाल और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश..
वोटर लिस्ट से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की गई थीं। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया पर उठे 5 प्रमुख सवालों का जवाब अपने फैसले में दिया है:

1. क्या चुनाव आयोग के पास SIR करने की शक्ति है..
आदेश: हां, बिल्कुल है। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग ने अपनी वैधानिक शक्तियों के दायरे में रहकर ही काम किया है। इसे 'अल्ट्रा वायर्स' (गैरकानूनी) नहीं ठहराया जा सकता। विवादित SIR का उद्देश्य चुनाव को बाधित करना नहीं, बल्कि निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव के संवैधानिक जनादेश की रक्षा करना है।

2. क्या इसका कोई वैध उद्देश्य है या यह प्रक्रिया मनमानी है..
आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि SIR की पूरी प्रक्रिया संतुलित और सही है। इसका एकमात्र मकसद वोटर लिस्ट को साफ-सुथरा रखना है। आयोग द्वारा उठाए गए कदम जरूरत से ज्यादा सख्त या गलत नहीं हैं।

3. क्या SIR 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' (RP Act) के खिलाफ है..
आदेश: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह प्रक्रिया कानूनी रूप से मान्य और जनहित में उचित है, इसलिए यह 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' (Representation of the People Act) के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं करती।

4. क्या चुनाव आयोग को दस्तावेज मांगने का हक है..
आदेश: कोर्ट ने कहा कि वेरिफिकेशन के लिए दस्तावेजों की मांग करना बिल्कुल व्यावहारिक है। पहले से तय 11 दस्तावेजों और अब कोर्ट के आदेश के बाद 'आधार कार्ड' को 12वें दस्तावेज के रूप में शामिल किए जाने के बाद, इस प्रक्रिया को मनमाना नहीं कहा जा सकता।

5. जिन लोगों के नाम कटे हैं, अब उनका क्या होगा..
आदेश: जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनका मामला 4 हफ्ते में नागरिकता से संबंधित सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) को भेजा जाएगा। वह प्राधिकारी आगामी चुनावों से पहले संबंधित व्यक्तियों को नोटिस देगा, उन्हें अपनी बात रखने का पूरा मौका देगा और फिर फैसला करेगा। अगर वे नागरिक साबित होते हैं, तो उनका नाम दोबारा वोटर लिस्ट में जोड़ा जाएगा। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि वोटर लिस्ट से नाम हटने मात्र से किसी की नागरिकता खत्म नहीं हो जाती।

बिहार में SIR के बाद 6% घटे वोटर्स, पटना में बढ़े तो सारण में कटे नाम..
बिहार में करीब 22 साल बाद (2003 के बाद) 24 जून 2025 से यह विशेष अभियान (SIR) शुरू किया गया था। 1 अक्टूबर 2025 को जारी हुई फाइनल लिस्ट के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले रहे:

  • कुल वोटर्स की संख्या घटी:
    जून 2025 में बिहार में कुल 7.89 करोड़ वोटर्स थे, जो फाइनल लिस्ट के बाद 6% घटकर 7.42 करोड़ रह गए।

  • लाखों नाम कटे:
    फाइनल लिस्ट से कुल 69.29 लाख नाम हटाए गए, जबकि 21.53 लाख नए नाम जोड़े गए।

  • नाम कटने की मुख्य वजहें:
    छानबीन में 22.34 लाख लोग मृत पाए गए, 6.85 लाख लोगों के नाम दो जगहों पर दर्ज थे और 36.44 लाख लोग दूसरी जगहों पर शिफ्ट हो चुके थे।

'आधार' पहचान पत्र है, नागरिकता का नहीं: सुप्रीम कोर्ट..
शुरुआत में चुनाव आयोग ने इस वेरिफिकेशन के लिए 11 दस्तावेजों को ही मान्य किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए आधार कार्ड को 12वें दस्तावेज के रूप में शामिल करने का आदेश दिया था। कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी की थी कि आधार केवल पहचान का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं। हालांकि, वोटर लिस्ट में पहचान की पुष्टि के लिए इसका इस्तेमाल किया जाना सही है।

विपक्ष के क्या थे आरोप..
इस पूरी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर रहा है। विपक्षी दलों का आरोप था कि यह लोगों को उनके वोटिंग के अधिकार से वंचित करने की एक साजिश है। विपक्ष का तर्क था कि पिछले 22 साल में जब बिहार में इसी व्यवस्था के तहत 5 चुनाव शांतिपूर्वक हो चुके हैं, तो अचानक चुनाव से ठीक पहले इतनी जल्दबाजी में SIR कराने की क्या जरूरत थी? इसे चुनाव के बाद भी आराम से कराया जा सकता था।