मऊगंज की 'नई दिल्ली' में इंसान-जानवर एक ही कुंड का पानी पी रहे, हर घर नल योजना पर सवाल

मऊगंज के हनुमना ब्लॉक की नई दिल्ली बसाहट में 80 परिवार काई युक्त कुंड का पानी पीने को मजबूर हैं। जल जीवन मिशन और हर घर नल योजना पर सवाल उठ रहे हैं।

मऊगंज की 'नई दिल्ली' में इंसान-जानवर एक ही कुंड का पानी पी रहे, हर घर नल योजना पर सवाल

मऊगंज: मध्य प्रदेश में सरकार लगातार हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के दावे कर रही है। जल जीवन मिशन और हर घर नल-हर घर जल जैसी योजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च होने की बात कही जाती है। लेकिन मऊगंज जिले के हनुमना विकासखंड की ग्राम पंचायत करकचहा की 'नई दिल्ली' बसाहट की तस्वीर इन दावों पर कई सवाल खड़े करती है। यहां आज भी दर्जनों परिवार एक ऐसे पुराने कुंड के पानी पर निर्भर हैं, जहां इंसान और जानवर एक ही स्रोत से पानी पीते हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित पेयजल पहुंचाने के लिए लगातार योजनाएं चला रही है, तब आखिर ऐसी बसाहटें आज भी मूलभूत सुविधा से क्यों वंचित हैं? क्या योजनाओं का लाभ अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पा रहा या फिर स्थानीय स्तर पर कहीं न कहीं व्यवस्था कमजोर पड़ रही है? यही सवाल अब ग्रामीण भी उठा रहे हैं।

सबसे पहली वजह इस इलाके की भौगोलिक स्थिति मानी जा रही है। पहाड़ी क्षेत्र में बसे इस छोटे से गांव में करीब 80 परिवार रहते हैं और उनके लिए पीने के पानी का एकमात्र सहारा गांव के बीच स्थित पुराना कुंड है। गर्मियों में इस कुंड का जलस्तर काफी नीचे चला जाता है और पानी पर काई की मोटी परत जम जाती है। इसके बावजूद लोगों के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता।

दूसरी बड़ी बात यह है कि यही कुंड केवल इंसानों के लिए नहीं बल्कि मवेशियों और जंगली जानवरों के लिए भी पानी का स्रोत बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि जानवर उसी पानी को सीधे पीते हैं, जबकि लोग मजबूरी में कपड़े से छानकर उसे घर ले जाते हैं। स्थानीय लोगों के मुताबिक इसी वजह से पिछले कुछ महीनों में कई ग्रामीण पेट दर्द, उल्टी और दस्त जैसी समस्याओं से भी परेशान हुए हैं। हालांकि इन बीमारियों का कारण स्वास्थ्य विभाग की ओर से आधिकारिक रूप से इस पानी को नहीं बताया गया है।

इसके अलावा ग्रामीणों का आरोप है कि जल जीवन मिशन और हर घर नल योजना का लाभ उनकी बसाहट तक नहीं पहुंचा। उनका कहना है कि न तो यहां पाइपलाइन बिछाई गई और न ही नियमित रूप से वैकल्पिक जल आपूर्ति की व्यवस्था की गई। कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि क्षेत्र में लगाए गए हैंडपंप प्रभावशाली लोगों की सुविधा वाले स्थानों पर स्थापित कर दिए गए, जबकि उनकी बस्ती आज भी पेयजल संकट झेल रही है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

हालांकि सरकारी स्तर पर जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल सुविधाओं के विस्तार के दावे लगातार किए जाते रहे हैं। समीक्षा बैठकों और विभागीय प्रेस नोट में भी योजनाओं की प्रगति का उल्लेख होता है। लेकिन नई दिल्ली बसाहट की स्थिति यह संकेत देती है कि कुछ इलाकों में अभी भी योजनाओं का लाभ पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर पाया है। ऐसे मामलों में स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ जाती है।

यही कारण है कि अब ग्रामीणों का आक्रोश खुलकर सामने आने लगा है। समाजसेवी दशरथ प्रसाद कोरी समेत कई ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से समस्या उठाने के बावजूद समाधान नहीं हुआ। उनका कहना है कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि गांव पहुंचते हैं, लेकिन बाद में उनकी समस्याओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द स्थायी समाधान नहीं निकला तो वे अपने अधिकारों के लिए आंदोलन का रास्ता अपनाने को मजबूर होंगे।

ऐसे में यह मामला केवल एक गांव की पेयजल समस्या तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह उन सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत का भी सवाल बन जाता है जिनका उद्देश्य हर ग्रामीण परिवार तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाना है। यदि ऐसी बसाहटें अब भी स्वच्छ पानी के लिए संघर्ष कर रही हैं, तो यह संकेत है कि योजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा की आवश्यकता है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि स्थानीय प्रशासन और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग इस मामले पर क्या कदम उठाते हैं। क्या नई दिल्ली बसाहट के लोगों को जल्द स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा, या फिर यह गांव भी सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद उस खाई का एक और उदाहरण बनकर रह जाएगा।