पब्लिक वाणी खास खबर : 41 दिन इलाज, फिर मौत... एमपी में बाघों की मौत का आंकड़ा 51 के पार
Public Vani Khas Khabar : कान्हा की बाघिन ने खोला संरक्षण व्यवस्था का कमजोर पक्ष, बीमारी-निगरानी और मौतों के रिकॉर्ड पर सवाल
गणेश पाण्डेय @ भोपाल
कान्हा टाइगर रिजर्व में 41 दिन तक उपचार के बाद एक बाधिन की मौत हो गई। इस मौत ने मध्यप्रदेश की टाइगर कंजर्वेशन व्यवस्था पर फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 26 अगस्त 2026 को बेहद कमजोर हालत में मिली इस बाधिन का तब से उपचार शुरू हुआ, लेकिन 6 अक्टूबर को उसने दम तोड़ दिया। 7 अक्टूबर को एनटीसीए की एसओपी के तहत पोस्टमार्टम कराया गया और विसरा व अन्य नमूने फोरेंसिक एवं पैथोलॉजिकल जांच के लिए जबलपुर भेजे गए है। विभागीय स्तर पर कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) की आशंका जताई जा रही है, लेकिन अंतिम कारण जांच रिपोर्ट के बाद साफ होगा। यह अकेली मौत नहीं है। 29 सितंबर तक मध्यप्रदेश में इस साल बाघों की मौत का आंकड़ा 50 बताया गया था। इसके बाद 6 अक्टूबर की कान्हा वाली मौत को जोड़ें तो राज्य स्तर पर मौत का आंकड़ा 51 के पार पहुंच गया है।
दूसरी ओर एनटीसीए के आधिकारिक ऑनलाइन मृत्यु रिकॉर्ड में 6 अक्टूबर तक मध्यप्रदेश के 47 प्रकरण दर्ज दिखाई देते हैं और डेटाबेस का अंतिम अपडेट 6 अक्टूबर का है। यानी राज्य में सामने आ रहे आंकड़े और केंद्रीय डेटाबेस के बीच अंतर भी अब जांच का विषय बन गया है।
सवाल सिर्फ मौतों की संख्या का नहीं, मौत रोकने की व्यवस्था का है। एनटीसीए स्वयं स्पष्ट कर चुका है कि किसी वाघ की मौत को प्राकृतिक या शिकार मानने के लिए पोस्टमार्टम, पैथोलॉजी, फोरेंसिक रिपोर्ट, तस्वीरों और अन्य प्रमाणों की जरूरत होती है तथा प्राकृक्तिक/पोचिंग होने का प्रमाण प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी राज्य की है।
वैज्ञानिक सर्विलांस और सैंपलिंग की पर्याप्त व्यवस्था थी
कान्हा की इस बाधिन का मामला इसलिए ज्यादा गंभीर है, क्योंकि वह 26 अगस्त को ही असामान्य रूप से कमजोर हालत में दिखाई दे गई थी। इसके बाद 41 दिन तक उपचार चला। यदि बीमारी सीडीवी थी, तो सवाल उठता है कि प्रारंभिक चरण में बीमारी की पहचान कितनी जल्दी हुई। क्या आसपास के बाघों की तत्काल स्वास्थ्य निगरानी बढ़ाई गई।
क्या संभावित संक्रमण की स्थिति में वैज्ञानिक सर्विलांस और सैंपलिंग की पर्याप्त व्यवस्था थी। इससे पहले भी कान्हा में बीमारी से जुड़ी मौतें चिंता बढ़ाती रही हैं। ताजा रिपोर्ट के अनुसार इस बाधिन की मौत के साथ कान्हा में सीडीवी से जुड़ी मौतों की संख्या नौ बताई गई है। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश में मौतें केवल बीमारी तक सीमित नहीं है।
एनटीसीए रिकॉर्ड में इस वर्ष राज्य के भीतर टाइगर रिजर्व के साथ-साथ राजस्व और वन क्षेत्रों में भी बाधों की मौतें दर्ज है। इनमें करपा, शाहडोल, बुढ़नी सीहोर, नर्मदापुरम, बालाघाट, सतना, सिवनी और रायसेन जैसे क्षेत्र शामिल है। कुछ घटनाए रिजर्व से बाहर हुई, जिससे कॉरिडोर, बिजली, मानव गतिविधि और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठते हैं।
मौत के बाद शीर्ष अफसर फोरेंसिक रिपोर्ट तक सीमित
बड़ा सवाल यह है कि क्या विभाग मौत के बाद पोस्टमार्टम और फोरेंसिक रिपोर्ट तक सीमित है अथवा मौत से पहले जोखिम पहचानने की भी प्रभावी व्यवस्था है। कमजोर, बीमार या घायल बाध की शुरुआती पहचान, त्वरित मेडिकल डायग्नोसिस, रोग निगरानी, कॉरिडोर मॉनिटरिंग और संवेदनशील क्षेत्रों में चौबीस घंटे निगरानी की प्रभावशीलता अब जांच के दायरे में आनी चाहिए।
आज तक बाकी किसी भी मौत के बाद फॉरेंसिक जांच को सार्वजनिक नहीं किया गया। बांधवगढ़ में ट्रॅकुलाइजर के ओवरडोज से हुई बाघ की मौत की रिपोर्ट पर कराई गई फॉरेंसिक रिपोर्ट को आज तक सार्वजनिक तौर उजागर नहीं किया गया।
मौत रोकने के लिए क्या किया गया, क्या जवाबदेही तय होगी
विशेषज्ञों का मानना है कि बाधों की बढ़ती मौतों के बीच केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि शव का पोस्टमार्टम हुआ, नमूने लैब भेजे गए और एनटीसीए एसओपी का पालन किया गया। जरूरत इस बात की है कि हर मौत से पहले क्या हुआ, किस स्तर पर निगरानी विफल हुई और मौत रोकने के लिए क्या किया गया।
इसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। कान्हा की 41 दिन की जद्दोजहद अब यही सवाल छोड़ गई है कि बीमारी से लड़ाई बाधिन की मौत के बाद शुरू हुई या उसे कमजोर होते समय ही पूरी वैज्ञानिक ताकत से शुरू कर दिया गया था।

