अंदर की बात : वन प्लस की नहीं, तो मंत्री की विदाई

Ander Ki Baat : मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल के एक सदस्य के ओएसडी को विभाग में वन प्लस के नाम से जाना जाता है।

अंदर की बात : वन प्लस की नहीं, तो मंत्री की विदाई

मृगेन्द्र सिंह @ भोपाल 

अब वन प्लस नाम कैसे पड़ा, इसको लेकर विभाग के अफसर कहते है कि जब भी साहेब से मिलने जाते हैं, तो एक ही बात कहते हैं कि जो भी करो उसमें वन प्लस मेरा कर देना, लेकिन किसी को बताना नहीं। अब समझ गए होंगे कि वन प्लस का मतलब क्या है। आपको यह जरूर बता दें कि वन प्लस के साथ हमेशा कार्यालय में बैठने वाले एक विवादास्पद अफसर की यदि जल्दी मंत्री बंगले से विदाई नहीं हुई, तो मंत्री जी कि विदाई तय है। यदि मान लें कि किसी तरह मंत्री जी का पद बच भी जाता है, तो 2028 में उनकी राह कठिन हो जाएगी। यानी विधानसभा का चुनाव जीतना कठिन हो जाएगा। मंत्री जी के विधानसभा क्षेत्र के लोग भी ओएसडी साहेब के रवैए से बहुत दुखी हैं। अब यहां तक कहने लगे हैं कि 2028 में ओएसडी साहेब से ही वोट ले लेंगे।

सचिव का ग्वालियर कनेक्शन

प्रदेश के एक प्रमुख विभाग के सचिव की इस समय ग्वालियर कनेक्शन की बड़ी चर्चा है। चर्चा इस बात की है कि ग्वालियर बाले साहेब ने सचिव महोदय के विभाग के ठेके के लिए कुछ लोंगों से एडवांस में राशि ले ली है, लेकिन विभाग के मंत्री ने शिकायतों के बाद ठेके पर रोक लगा दी और कहा कि जब तक विभाग के सचिव का स्थानांतरण नहीं होगा, तब तक कोई टेंडर नहीं होगा। मंत्री ने मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को कथित ईमानदार सचिव की पूरी कुंडली बता दी है। साथ में यह भी बता दिया है कि ग्वालियर वाले शर्मा के पास साहेब का पैसा तबसे जमा हो रहा है, जब वे ग्वालियर कलेक्टर थे।

आईएएस पर इतनी मेहरबानी क्यों

एक युवा आईएएस अधिकारी जिले में कलेक्टर हैं। उनके जिले में स्वास्थ्य विभाग की हालत बहुत खराब है। अब हालात बेकाबू हो गए और साहेब स्थिति को संभालने में नाकाम रहे और जिले की पूरे देश में बहुत बदनामी हुई। इससे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बहुत नाराज हुए और मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल से कहा कि तत्काल उक्त कलेक्टर को बदल दिया जाए।

बहरहाल, ऐसा हुआ नहीं, क्योंकि मुख्य सचिव सहित्त अधिकांश आईएएस अफसर युवा आईएएस को बचाने में लग गए हैं। अधिकारी मुख्यमंत्री को यह समझाने में सफल हो गए कि युवा अफसर को किसी छोटे जिले की जिम्मेदारी सौंप दी जाए। अब सवाल यह है कि जब युवा अफसर की कार्यप्रणाली सबको मालूम थी, फिर महत्वपूर्ण जिले की कमान क्यों सौपी गई।

सुबह की ब्रीफिंग नहीं करते एसपी

राजधानी से दूरस्थ जिले में पदस्थ एक एसपी साहेब अपने आईजी और डीआईजी को सुबह घटनाक्रम की जानकारी नहीं देते हैं, जिससे डीआईजी और आईजी को विशेष शाखा के अधिकारी से जानकारी लेकर एडीजी इंटलीजेंस को जानकारी देनी पड़ती है। आईजी ने डीजीपी को भी एसपी के मनमानी की शिकायत की है। फिर भी एसपी की कार्यप्रणाली में कोई सुधार नहीं हुआ। चर्चा है कि एसपी साहेब को और बड़े जिले की कमान देने की तैयारी है। सवाल यह कि इतने नाफरमान अफसर पर आखिरकार मेहरवानी किसकी है।